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यमुनाघाटी में 56 गांव के ग्रामीण मनाते हैं देवलांग त्यौहार 18-27-54
Updated Fri, 17 Nov 2017 11:02 PM IST
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बड़कोट। मंगसीर की बग्वाल (दीपावली) यमुना घाटी में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। रंवाई क्षेत्र के गैर बनाल में करीबन 56 गांवों के ग्रामीण इसे देवलांग पर्व के रूप में मनाते हैं। 18 नवंबर रात को होने वाले इस पर्व में बड़ी संख्या में बाहर रह रहे ग्रामीण अपने गांव आते हैं।
गोरखा युद्ध के समय मलेथा गांव के वीर भड माधो सिंह भंडारी विजयी होकर लौटे थे। इस खुशी में कार्तिक मास की दीपावली को न मनाकर मंगसीर मास की दीपावली यानी बग्वाल मनाई जाती है। गैर बनाल के अलावा कोटी गगंटाडी में भी देवलांग मंगसीर की बग्वाल को विशेष तौर से मनाया जाता है। बनाल क्षेत्र में साठी और पानसाई थोक हैं, जो दो दलों के रूप में गैर गांव में रात्री को पहुंचते हैं और दोनों ही दल जंगल से लाए गए देवदार के हरे वृक्षों को डंडों के बल पर खड़ा करते हुए ग्रामीणों द्वारा उस पर आग लगा दी जाती है। इस अनोखे पर्व को मनाने के लिए ग्रामीण एक माह पूर्व जंगल से सूखी लकड़ी के छिलके लाकर राजा रघुनाथ मंदिर परिसर में लाकर रखते हैं, जिसे फिर देवदार के वृक्ष पर बांधकर सुबह होते ही ढोल नगाड़ो की थाप पर और लोकनृत्य के साथ डंडों के बल पर अग्निकुंड में खड़ा कर दिए जाते हैं और आग लगाई जाती है। देवलांग का यह पर्व खुशहाली का प्रतीक है।
गोरखा युद्ध के समय मलेथा गांव के वीर भड माधो सिंह भंडारी विजयी होकर लौटे थे। इस खुशी में कार्तिक मास की दीपावली को न मनाकर मंगसीर मास की दीपावली यानी बग्वाल मनाई जाती है। गैर बनाल के अलावा कोटी गगंटाडी में भी देवलांग मंगसीर की बग्वाल को विशेष तौर से मनाया जाता है। बनाल क्षेत्र में साठी और पानसाई थोक हैं, जो दो दलों के रूप में गैर गांव में रात्री को पहुंचते हैं और दोनों ही दल जंगल से लाए गए देवदार के हरे वृक्षों को डंडों के बल पर खड़ा करते हुए ग्रामीणों द्वारा उस पर आग लगा दी जाती है। इस अनोखे पर्व को मनाने के लिए ग्रामीण एक माह पूर्व जंगल से सूखी लकड़ी के छिलके लाकर राजा रघुनाथ मंदिर परिसर में लाकर रखते हैं, जिसे फिर देवदार के वृक्ष पर बांधकर सुबह होते ही ढोल नगाड़ो की थाप पर और लोकनृत्य के साथ डंडों के बल पर अग्निकुंड में खड़ा कर दिए जाते हैं और आग लगाई जाती है। देवलांग का यह पर्व खुशहाली का प्रतीक है।
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