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परिवहन निगम के घाटे का शासन जिम्मेदार!

Sun, 01 May 2016 01:21 PM IST
आशीष डोभाल/ अमर उजाला, देहरादून
आशीष डोभाल/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 01 May 2016 01:21 PM IST
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uttarakhand roadways corporation in loss

उत्तराखंड में परिवहन निगम की खुद 935 एवं 200 अनुबंधित बसें सड़कों पर दौड़ रही है, इसके बावजूद निगम घाटे में चल रहा है।

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इसका सबसे बड़ा कारण है मानव संसाधन की कमी, मौजूद संसाधनों की बदहाल स्थिति और शासन पर निगम की लगातार बढ़ती देनदारी है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक शासन पर करीब 30 करोड़ से अधिक बकाया हो चुका है। इसके चलते निगम घाटे में है और कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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नुकसान के प्रमुख कारण
कमजोर संसाधन
निगम के बेड़े में कुल 1135 बसें और छह हजार से अधिक नियमित कर्मचारी हैं। इनमें 40 वोल्वो और अन्य सामान्य बसें हैं। इसमें से 200 बसे ओवरएज हो चुकी हैं, लेकिन पर्याप्त बसें न होने से इनका संचालन बंद नहीं हो पाया है।
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डग्गामारी
निगम के घाटे की एक प्रमुख वजह डग्गामारी है। अधिकारियों के तमाम दावों के बावजूद इस पर रोक नहीं लग पा रही है। स्थिति यह है कि आईएसबीटी, रिस्पना पुल और प्रिंस चौक आदि स्थानों पर खुलेआम डग्गामार वाहन सवारी बैठाकर ले जाते हैं और अधिकारी इन पर कोई कार्रवाई नहीं करते।

राजनीतिक दबाव
निगम भले ही घाटा उठा रहा है, लेकिन उसे राजनीतिक दबाव में मजबूरन परोपकार करना पड़ता रहा है। तमाम परेशानी उठाने के बावजूद निगम समाज के कई तबकों को किराए में छूट या फिर मुफ्त यात्रा की सहूलियतें दे रहा है। परिवहन बसों में छूट की 18 जनकल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं। जिसका वर्ष 2013 से भुगतान लटका हुआ है।

नहीं होती प्लानिंग
निगम में कई रूटों पर बिना सर्वे ही बसों का संचालन शुरू कर दिया गया है। इन रूटों पर मानक के अनुसार सवारी उपलब्ध न होने के कारण निगम को घाटा उठाना पड़ रहा है। राज विहार में निगम मुख्यालय के नाम पर हर महीने करीब एक लाख रुपये किराया दिया जा रहा है, जबकि निगम मुख्यालय का गांधी रोड स्थित आरएम कार्यालय में संचालन हो सकता है।

यदि शासन की ओर से समय-समय पर परिवहन निगम का बकाया मिलता रहे तो निगम फायदे में आ सकता है। शासन की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इसका समय पर भुगतान नहीं होता।

- उदय सिंह राणा, जीएम प्रशासन

रोडवेज की अपनी बसों के अलावा हायर की गई करीब 200 बसों में से 40 वाल्वो बसें हैं। अनुबंधित बसों पर निगम नकेल कसने में नाकाम है। कई नीतियां ऐसी बनाई गई हैं जिससे निगम की बजाय बसों के कुल मुनाफे में से 40 प्रतिशत सीधे अनुबंध करने वाले मालिक की जेब में जा रहा है।
- रवि पचौरी, महामंत्री, राज्य निगम कर्मचारी महासंघ, उत्तराखंड

अपने पत्रों के माध्यम से सरकार, शासन का ध्यान निगम की समस्याओं के प्रति आकर्षित करते रहे, कई बार मांगें पूरी न होने पर आंदोलन किए गए। निगम की खुशहाली के लिए हरसंभव प्रयास किए और कर भी रहे हैं।
- रामचंद्र रतूड़ी, महामंत्री, रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद

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