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बर्बादी का मंजर देख निकल गई जान

Thu, 11 Jul 2013 08:35 AM IST
वेद विलास उनियाल/संदीप थपलियाल
वेद विलास उनियाल/संदीप थपलियाल Updated Thu, 11 Jul 2013 08:35 AM IST
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uttarakhand floods

आपदा से तबाह हुए सिल्ली गांव के लोग अब मुआवजे के भरोसे जिंदगी नहीं देखते हैं। उनका कहना है कि सरकार तबाह हुए परिवार के लोगों को नौकरी दें और पर्याप्त मुआवजा का बंदोबस्त करे।

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सिल्ली गांव में नदी किनारे कई घर डूबे हैं। यहां बर्बादी इस तरह छायी कि एक एक शादीशुदा युवक इसे देख नहीं पाया और सदमे से उसकी मौत हो गई। विकास बेंजवाल नाम के इस युवक की दो माह पूर्व ही शादी हुई थी।
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बैकिंग में जाने वाला पहला युवक
विकास की मौत गांव के लिए दोहरा सदमा लेकर आई। गांव की प्रधान अरुणा बेंजवाल कहती है कि विकास से गांव के लोगों को बहुत उम्मीद थी। बैंकिंग के फील्ड में जाने वाला वह पहला युवक था। गांव के प्रति उसका गहरा लगाव था। वह अक्सर गांव की उन्नति और विकास की बात करता था।
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केदारनाथ की आपदा के बाद उसने कई बार अपने साथियों को फोन किया। वह बार-बार अपने साथियों को फोन करता और गांव के बारे में पूछता था।

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गांव के लोगों ने उसे गांव के हालात नहीं बताए। इसके बाद 20 जून को वह अपनी नवेली पत्नी को लेकर गांव आया। यहां आते ही उसे गांव का विनाश दिखा। वह डूबे घरों को देखकर रोने लगा। फिर वह सामान्य सा हो गया था। वह सबसे मिला और कह रहा था कि संकट की इस घड़ी में हम सब साथ रहेंगे।

फिर वह अगस्त्यमुनि में भी अपने दोस्तों को मिलने गया। इसके बाद वह सिल्ली लौट गया। शाम को ही उसकी तबियत खराब हो गई। उसे बचाया नहीं जा सका। अब गांव के लोग अपने डूबे मकानों के लिए भी रो रहे है और विकास के लिए भी सिसक रहे हैं।

कई घर डूब गए
सिल्ली में सब कुछ थम गया है। यहां बीए में पढ़ने वाली प्रियंका गोस्वामी कहती है कि कई घर डूब गए। मेरा घर भी डूबने वाला है। क्या करेंगे हम, ना स्कूल ना खेती। बगल में ही उसकी मां भी खड़ी थी वह रोने लगती है, पूरे घर में रेत घुस गई है। यहां अब बसने लायक नहीं रहा। इसी गांव के रमेश चंद्र बेंजवाल मिलते हैं।

सबसे पहले इनका घर ही ढहा। वह कहते हैं कि 1956 में गंगतल से मेरे पिताजी यहां आकर बसे थे। फिर देखते ही देखते यहां सारा गांव बस गया। सिल्ली एक चट्टी भी थी, इसलिए इसे आराम नगर भी कहते थे। वह बताते है कि कितनी भी भारी बरसात हुई हो, कितनी भी बाढ़ आई लेकिन पानी कभी इस स्तर तक नहीं चढ़ा।


यह तबाही पहली बार ही दिखी। लगता था जैसे नदी हमको निगल जाएगी। खतरा आज भी है पानी कभी भी लपेट मार सकता है। अब यहां से जाना ही एकमात्र समाधान है। लेकिन हम जाए कहां, दो लाख रुपये में होगा क्या। हमें स्थायी सामाधान चाहिए। सिल्ली में हर कोई यही कहता है। कभी कल्पना नहीं की थी कि पानी इतना ऊपर आएगा।

इस गांव में पच्चीस मकान धड़धड़ाते हुए बहे और बाईस मकानकभी भी ढह सकते हैं। अधिकांश खाली हो गए हैं। पूरा गांव दहशत में है।

लोगों ने खतरे को भांप लिया
लोग बरसात के मौसम में हर स्थिति में रहने के आदी थे। लेकिन इस बार पानी जिस तरह चढ़ा और जिस रफ्तार से बहने लगा उससे गांव के लोगों ने खतरे को भांप लिया था। इसलिए जिंदगी तो बच गई पर खेत-खलिहान घर को वह नहीं बचा सके। इस गांव के आने-जाने वाली केदारनाथ मार्ग की मुख्य सड़क कभी इस ओर टूटती है कभी उस ओर।

दिन में कई बार ऐसी स्थितियों से जूझना होता है। फिलहाल गांव के लोग इस अपेक्षा में है कि कहीं से उनके लिए व्यवस्था तो हो।

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