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Udham Singh Nagar News: निर्यात में कमी से उत्पादन धीमा, सिडकुल में शिफ्ट घटने से रोजगार संकट
Tue, 31 Mar 2026 12:52 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Tue, 31 Mar 2026 12:52 AM IST
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रुद्रपुर। ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच बढ़ते तनाव की चपेट में सिडकुल व आसपास के उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक भी आ सकते हैं। निर्यात ऑर्डर में गिरावट और कच्चे माल की आपूर्ति कम होने से कई इकाइयों ने उत्पादन घटा दिया है। जहां तीन शिफ्टें चलती थी वहां अब दो में काम हो रहा है। ऐसे में संसाधनों व कामगारों की संख्या में कटौती की आशंका गहरा रही है।
सिडकुल की ऑटो पार्ट्स, एपएमजीसी और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी फैक्ट्रियों में पहले जहां तीन शिफ्टों में काम होता था, अब कई स्थानों पर दो या एक शिफ्ट में ही उत्पादन सीमित कर दिया गया है। उद्यमियों के अनुसार खाड़ी देशों से नए ऑर्डर धीमे पड़ गए हैं जबकि पुराने ऑर्डर भी होल्ड पर हैं। ऐसे में उत्पादन बनाए रखना चुनौती बन गया है। इसका सबसे ज्यादा असर ठेका और दैनिक मजदूरों पर पड़ा है। कई फैक्ट्रियों में अस्थायी कर्मचारियों की संख्या घटाई जा रही है। कुछ जगहों पर काम के घंटे भी कम कर दिए गए हैं। मजदूरों को आय में कमी का सामना करना पड़ रहा है जिससे उनके सामने रोजमर्रा के खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है।
सिडकुल इंटरप्रेंयोर वेलफेयरएसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अजय तिवारी का कहना की यदि अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले समय में स्थायी कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल कंपनियां लागत कम करने और वैकल्पिक बाजार तलाशने की कोशिश में जुटी हैं।
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ऑर्डर लगातार घट रहे हैं इसलिए हमें शिफ्ट कम करनी पड़ी हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो आगे और कटौती करनी पड़ सकती है।- अश्विन राठौर, फैक्ट्री मैनेजर
- यह पूरी तरह से ग्लोबल संकट का असर है। अगर युद्ध लंबा चला तो विवश होकर कंपनियों को अपने संसाधनों और कर्मियों में कटौती करनी पड़ सकती है। सरकार से अपेक्षा है कि उद्योगों को राहत और वैकल्पिक निर्यात बाजार उपलब्ध कराए जाएं। - श्रीकर सिन्हा, अध्यक्ष, सिडकुल इंटरप्रेन्योर वेलफेयर एसोसिएशन
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युद्ध की चिंगारी से फार्मा सेक्टर भी झुलसा, सप्लाई चेन प्रभावित
आयात-निर्यात पर पड़ा असर, दवाओं के उत्पादन और वितरण दोनों पर बढ़ गया दबाव
रुद्रपुर। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी युद्ध तनाव का असर अब फार्मा सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे माल और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में तेज उछाल के कारण दवा कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। इसका सीधा असर बाजार में दवाओं के दाम पर पड़ रहा है। आम मरीजों के लिए जरूरी दवाएं अब पहले की तुलना में महंगी होती जा रही हैं।
उद्यमियों के अनुसार कई जरूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स और केमिकल्स का आयात युद्ध के चलते प्रभावित हुआ है। सप्लाई चेन बाधित होने से कच्चे माल की उपलब्धता कम हो गई है। इससे कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वहीं पैकेजिंग मटेरियल जैसे प्लास्टिक, एल्युमिनियम फॉयल और कागज की दरें भी तेजी से बढ़ी हैं। स्थिति यह है कि चार गुना कीमत देने के बावजूद कई जगह पैकेजिंग सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
इसके अलावा, निर्यात-आयात पर भी असर पड़ा है। उद्यमियों के अनुसार कई जहाज गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जबकि सुरक्षा कारणों से कारोबारी माल भेजने से भी बच रहे हैं। इससे दवाओं के उत्पादन और वितरण दोनों पर दबाव बढ़ गया है।स्थानीय बाजार में दवा विक्रेताओं का कहना है कि पिछले एक महीने में कई दवाओं के दाम 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। कंपनियां धीरे-धीरे कीमतें बढ़ा रही हैं जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि युद्ध और सप्लाई संकट लंबे समय तक जारी रहा तो दवाओं की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों को समय रहते हस्तक्षेप कर राहत उपाय लागू करने की जरूरत है ताकि आम जनता पर इसका प्रभाव कम किया जा सके।
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उद्यमियों की बात
- तमाम कंपनियों का उत्पादन काफी कम हुआ है। क्योंकि ज्यादातर उद्यमी अपने उत्पादों का रेट बढ़ाना भी नहीं चाहते लेकिन उन्हें महंगे रेट पर कच्चा माल खरीदना पड़ रहा है। अमित सिंह राठौर, फार्मा कारोबारी
- कच्चा माल महंगा मिल रहा है। ट्रांसपोर्ट और पैकेजिंग लागत भी बढ़ गई है। ऐसे में कीमत बढ़ाना मजबूरी है हालांकि हम इसे नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे हैं।- कमलेश मझीला, प्लांट हेड
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सिडकुल की ऑटो पार्ट्स, एपएमजीसी और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी फैक्ट्रियों में पहले जहां तीन शिफ्टों में काम होता था, अब कई स्थानों पर दो या एक शिफ्ट में ही उत्पादन सीमित कर दिया गया है। उद्यमियों के अनुसार खाड़ी देशों से नए ऑर्डर धीमे पड़ गए हैं जबकि पुराने ऑर्डर भी होल्ड पर हैं। ऐसे में उत्पादन बनाए रखना चुनौती बन गया है। इसका सबसे ज्यादा असर ठेका और दैनिक मजदूरों पर पड़ा है। कई फैक्ट्रियों में अस्थायी कर्मचारियों की संख्या घटाई जा रही है। कुछ जगहों पर काम के घंटे भी कम कर दिए गए हैं। मजदूरों को आय में कमी का सामना करना पड़ रहा है जिससे उनके सामने रोजमर्रा के खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है।
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सिडकुल इंटरप्रेंयोर वेलफेयरएसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अजय तिवारी का कहना की यदि अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले समय में स्थायी कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल कंपनियां लागत कम करने और वैकल्पिक बाजार तलाशने की कोशिश में जुटी हैं।
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ऑर्डर लगातार घट रहे हैं इसलिए हमें शिफ्ट कम करनी पड़ी हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो आगे और कटौती करनी पड़ सकती है।- अश्विन राठौर, फैक्ट्री मैनेजर
- यह पूरी तरह से ग्लोबल संकट का असर है। अगर युद्ध लंबा चला तो विवश होकर कंपनियों को अपने संसाधनों और कर्मियों में कटौती करनी पड़ सकती है। सरकार से अपेक्षा है कि उद्योगों को राहत और वैकल्पिक निर्यात बाजार उपलब्ध कराए जाएं। - श्रीकर सिन्हा, अध्यक्ष, सिडकुल इंटरप्रेन्योर वेलफेयर एसोसिएशन
युद्ध की चिंगारी से फार्मा सेक्टर भी झुलसा, सप्लाई चेन प्रभावित
आयात-निर्यात पर पड़ा असर, दवाओं के उत्पादन और वितरण दोनों पर बढ़ गया दबाव
रुद्रपुर। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी युद्ध तनाव का असर अब फार्मा सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे माल और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में तेज उछाल के कारण दवा कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। इसका सीधा असर बाजार में दवाओं के दाम पर पड़ रहा है। आम मरीजों के लिए जरूरी दवाएं अब पहले की तुलना में महंगी होती जा रही हैं।
उद्यमियों के अनुसार कई जरूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स और केमिकल्स का आयात युद्ध के चलते प्रभावित हुआ है। सप्लाई चेन बाधित होने से कच्चे माल की उपलब्धता कम हो गई है। इससे कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वहीं पैकेजिंग मटेरियल जैसे प्लास्टिक, एल्युमिनियम फॉयल और कागज की दरें भी तेजी से बढ़ी हैं। स्थिति यह है कि चार गुना कीमत देने के बावजूद कई जगह पैकेजिंग सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
इसके अलावा, निर्यात-आयात पर भी असर पड़ा है। उद्यमियों के अनुसार कई जहाज गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जबकि सुरक्षा कारणों से कारोबारी माल भेजने से भी बच रहे हैं। इससे दवाओं के उत्पादन और वितरण दोनों पर दबाव बढ़ गया है।स्थानीय बाजार में दवा विक्रेताओं का कहना है कि पिछले एक महीने में कई दवाओं के दाम 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। कंपनियां धीरे-धीरे कीमतें बढ़ा रही हैं जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि युद्ध और सप्लाई संकट लंबे समय तक जारी रहा तो दवाओं की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों को समय रहते हस्तक्षेप कर राहत उपाय लागू करने की जरूरत है ताकि आम जनता पर इसका प्रभाव कम किया जा सके।
उद्यमियों की बात
- तमाम कंपनियों का उत्पादन काफी कम हुआ है। क्योंकि ज्यादातर उद्यमी अपने उत्पादों का रेट बढ़ाना भी नहीं चाहते लेकिन उन्हें महंगे रेट पर कच्चा माल खरीदना पड़ रहा है। अमित सिंह राठौर, फार्मा कारोबारी
- कच्चा माल महंगा मिल रहा है। ट्रांसपोर्ट और पैकेजिंग लागत भी बढ़ गई है। ऐसे में कीमत बढ़ाना मजबूरी है हालांकि हम इसे नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे हैं।- कमलेश मझीला, प्लांट हेड