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आलू की फसल को झुलसा रोग का खतरा
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झुलसा रोग से ग्रस्त आलू का पत्ता। संवाद
- फोटो : KASHIPUR
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बारिश की नमी से आलू पर पछेती झुलसा रोग का खतरा बढ़ गया है जिससे आलू उत्पादक किसान चिंतित हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी (केवीके) प्रभारी डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने बताया कि बीते दो तीन-दिनों से हो रही बेमौसमी बारिश से वातावरण में नमी बढ़ने से आलू की फसल पर झुलसा रोग का खतरा मंडराने लगा है। अगर जल्द रोकथाम नहीं हुई तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
मौसम की यह स्थिति आलू की फसल में रोग बढ़ाने के लिए बेहद अनुकूल है। डॉ. क्वात्रा ने बताया कि पछेती झुलसा में आलू की पत्तियां किनारों से या नोक से झुलसना शुरू होती हैं और धीरे-धीरे पूरी पत्ती में फैल जाता है। सफेद रंग की फफूंदी दिखाई देने लगती है और इस तरह रोग फैलने से पूरा पौधा काला पड़कर झुलस जाता है। कंद नहीं बनते अगर बनते भी हैं तो बहुत छोटे बनते हैं।
झुलसा रोग से बचाव के लिए आलू के खेत में पानी जमा नहीं होने दिया जाना चाहिए और जल निकासी का बेहतर प्रबंध करना चाहिए। झुलसा रोग दिखाई देने पर रासायनिक विधि से एजोक्सिस्ट्रोबिन 11 प्रतिशत, टेबुकोनाजोल 18.3 की 300 मिली मात्रा या क्लोरोथालोनिल 75 प्रतिशत की 400 ग्राम कीटाजिन 48 प्रतिशत ईसी की 300 मिली मात्रा या मेटालैक्सिल 4 प्रतिशत, मैनकोजेब 64 प्रतिशत, डब्ल्यूपी की 600 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ खेत में 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। संवाद
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कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी (केवीके) प्रभारी डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने बताया कि बीते दो तीन-दिनों से हो रही बेमौसमी बारिश से वातावरण में नमी बढ़ने से आलू की फसल पर झुलसा रोग का खतरा मंडराने लगा है। अगर जल्द रोकथाम नहीं हुई तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
मौसम की यह स्थिति आलू की फसल में रोग बढ़ाने के लिए बेहद अनुकूल है। डॉ. क्वात्रा ने बताया कि पछेती झुलसा में आलू की पत्तियां किनारों से या नोक से झुलसना शुरू होती हैं और धीरे-धीरे पूरी पत्ती में फैल जाता है। सफेद रंग की फफूंदी दिखाई देने लगती है और इस तरह रोग फैलने से पूरा पौधा काला पड़कर झुलस जाता है। कंद नहीं बनते अगर बनते भी हैं तो बहुत छोटे बनते हैं।
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झुलसा रोग से बचाव के लिए आलू के खेत में पानी जमा नहीं होने दिया जाना चाहिए और जल निकासी का बेहतर प्रबंध करना चाहिए। झुलसा रोग दिखाई देने पर रासायनिक विधि से एजोक्सिस्ट्रोबिन 11 प्रतिशत, टेबुकोनाजोल 18.3 की 300 मिली मात्रा या क्लोरोथालोनिल 75 प्रतिशत की 400 ग्राम कीटाजिन 48 प्रतिशत ईसी की 300 मिली मात्रा या मेटालैक्सिल 4 प्रतिशत, मैनकोजेब 64 प्रतिशत, डब्ल्यूपी की 600 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ खेत में 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। संवाद
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