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जनता ने सपा-बसपा गठबंधन को नकारा, प्रत्याशी की जमानत जब्त
Fri, 24 May 2019 12:01 AM IST
अरुण कुमार
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: अरुण कुमार
Updated Fri, 24 May 2019 12:01 AM IST
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नैनीताल-यूएस नगर लोकसभा सीट पर हुए चुनाव के परिणामों ने सपा-बसपा गठबंधन की उम्मीदों को मतदाताओं ने सिरे से नकार दिया। मोदी लहर के सामने कांग्रेस तो टिक नहीं सकी, बल्कि मायावती की रैली के बावजूद यूपी से आयातित बसपा प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाए। मतगणना के नतीजों में परिणाम सामने आए तो बसपा को पिछले चुनाव की तुलना में इस बार आधे वोट भी नहीं मिले और प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई।
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लोकसभा चुनाव का आगाज होने के साथ ही बसपा ने नैनीताल सीट पर सबसे पहले प्रत्याशी की घोषणा की। 2009 में सितारगंज के पूर्व विधायक नारायण पाल और 2014 में पिछड़े वर्ग के बसपा नेता लईक अहमद को मैदान में उतारने के बाद मायावती ने पहले वोटों का गणित लगाते हुए ब्राह्मण कार्ड खेला था।
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रुद्रपुर के राजेश दुबे को अपना प्रत्याशी घोषित करने के बाद एक सप्ताह के भीतर ही उनका टिकट काटकर बरेली में मेयर का चुनाव लड़ चुके और नैनीताल लोकसभा की राजनीति के नए चेहरे नवनीत अग्रवाल पर भरोसा जताते हुए उन्हें मैदान में उतारा था। मायावती ने पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए छह अप्रैल को रुद्रपुर के मोदी मैदान में रैली कर गठबंधन की हुंकार भरी थी। मायावती ने नोटबंदी, जीएसटी से लेकर आर्थिक स्थिति पर दिए जाने वाले दस फीसदी आरक्षण को मुद्दा बनाकर भाजपा कांग्रेस पर हमले किए थे।
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चुनाव में सपाइयों की सक्रियता दिखी कम
बसपा कार्यकर्ता तो चुनाव में जुटे थे, लेकिन सपाइयों की सक्रियता बेहद कम थी। परिणाम घोषित हुए तो बसपा पिछले चुनाव में मिले 59245 वोटों का आंकड़ा भी नहीं छू सकी और इस बार के चुनाव में सपा बसपा गठबंधन के प्रत्याशी को जनता ने सिरे से निकार दिया। पिछले बार की तरह ही पार्टी ने जमानत गंवाने का सिलसिला बरकरार रखा है। हालांकि पार्टी प्रत्याशी पिछले दो चुनाव की तरह इस बार भी तीसरा स्थान पर कब्जा जमाए रखा।
बसपा का खिसक रहा वोट बैंक
रुद्रपुर। लोकसभा चुनाव में भले ही राज्य के इतिहास में एक भी सीट पर बसपा काबिज नहीं हुई। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में बसपा हर बार किस्मत आजमाती रही है। मायावती ने हर चुनाव में अपने उम्मीदवार भी खड़े किए। 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने इस सीट पर सितारगंज के दो बार विधायक रहे नारायण पाल को उतारा था।
पाल इस जिले से करीब एक लाख दो हजार 434 वोट भी लेकर गए। 2014 के चुनाव में बसपा ने फिर अपनी रणनीति बदलते हुए मुस्लिम प्रत्याशी लईक अहमद को टिकट दे दिया। लईक को पाल से आधे वोट ही मिले। इस बार वैश्य समाज पर माया का भरोसा बना तो वो भी टूट गया और पिछले चुनाव से आधे भी वोट नहीं आए। तराई में दिन प्रतिदिन बसपा का वजूद खतरे में पड़ रहा है, जो पार्टी हाईकमान के लिए भी चिंता का सबब बना है।