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Udham Singh Nagar News: खैर की खुली लूट... अंधेरे में आरियां काट रहीं जंगलों के जीवन की डोर
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काशीपुर। तराई के जंगलों में खैर के पेड़ों की कटाई थमने का नाम नहीं ले रही। मुनाफे की भूख में तस्कर जंगलों को निचोड़ रहे हैं, और वन विभाग की कार्रवाई खोखली साबित हो रही है। औषधीय गुणों से भरपूर और कभी कत्था उद्योग की रीढ़ रहा यह दुर्लभ वृक्ष अब खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
वन विभाग ने खैर को दुर्लभ प्रजाति घोषित किया है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने भी इसे खतरे की सूची में रखा है। वर्ष 2004 में जारी सूची में भारत में पेड़ों की 45 प्रजातियां संकटग्रस्त बताई गई थीं। इनमें खैर भी शामिल है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग डायरिया, पाइल्स, दांतों और त्वचा के रोगों में होता है। बाजार में इसकी लकड़ी कत्था, पान मसाला, चारकोल और चमड़ा उद्योगों की मुख्य जरूरत है।
लाखों का मुनाफा, जंगलों का विनाश
खैर की लकड़ी बाजार में पांच से दस हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकती है। एक वयस्क पेड़ से तस्करों को पांच से सात लाख रुपये तक का फायदा होता है। यही वजह है कि रात के अंधेरे में आरी की आवाजें जंगलों के जीवन की डोर को काट रही हैं।
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घटती हरियाली की गवाही
वन विभाग की 2017-18 की उत्तराखंड वन सांख्यिकी के अनुसार प्रदेश में खैर का प्रतिशत महज 0.22 फीसदी था। यह अब घटकर 0.18 फीसदी के आसपास रह गया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि आठ वर्षों में हजारों पेड़ तस्करों की भेंट चढ़ चुके हैं।
विभाग की रिपोर्ट भी मौन
वन की सेहत का हाल बताने वाली उत्तराखंड वन सांख्यिकी पत्रिका पिछले आठ सालों से प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्थिति खुद वन विभाग की संवेदनहीनता पर सवाल खड़े करती है।
कोट...
जंगलों में खैर के पेड़ कम हो रहे हैं। यह चिंताजनक है। जंगल में खैर के पेड़ों की सुरक्षा की जानी चाहिए। वन कर्मियों को तस्करों के खिलाफ अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। - डॉ. साकेत बडोला, वन संरक्षक (पश्चिमी वृत्त)
इस साल कट गए इतने पेड़
वन प्रभाग कटे पेड़ मुकदमे
तराई केंद्रीय वन प्रभाग 95 65
तराई पूर्वी वन प्रभाग 80 55
तराई पश्चिमी वन प्रभाग 35 20
(स्रोत : वन विभाग के तीनों डिवीजन से प्राप्त आंकड़े)
प्रदेश के वन क्षेत्रों में प्रजातिवार वृक्षों का प्रतिशत
प्रजाति प्रतिशत
खैर 0.22
शीशम 0.58
देवदार 0.73
सागौन 0.78
यूकेलिप्टस 0.83
साल 12.10
बाज 14.81
चीड़ 15.25
(स्त्रोत : उत्तराखंड वन सांख्यिकी 2017-18)
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वन विभाग ने खैर को दुर्लभ प्रजाति घोषित किया है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने भी इसे खतरे की सूची में रखा है। वर्ष 2004 में जारी सूची में भारत में पेड़ों की 45 प्रजातियां संकटग्रस्त बताई गई थीं। इनमें खैर भी शामिल है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग डायरिया, पाइल्स, दांतों और त्वचा के रोगों में होता है। बाजार में इसकी लकड़ी कत्था, पान मसाला, चारकोल और चमड़ा उद्योगों की मुख्य जरूरत है।
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लाखों का मुनाफा, जंगलों का विनाश
खैर की लकड़ी बाजार में पांच से दस हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकती है। एक वयस्क पेड़ से तस्करों को पांच से सात लाख रुपये तक का फायदा होता है। यही वजह है कि रात के अंधेरे में आरी की आवाजें जंगलों के जीवन की डोर को काट रही हैं।
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घटती हरियाली की गवाही
वन विभाग की 2017-18 की उत्तराखंड वन सांख्यिकी के अनुसार प्रदेश में खैर का प्रतिशत महज 0.22 फीसदी था। यह अब घटकर 0.18 फीसदी के आसपास रह गया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि आठ वर्षों में हजारों पेड़ तस्करों की भेंट चढ़ चुके हैं।
विभाग की रिपोर्ट भी मौन
वन की सेहत का हाल बताने वाली उत्तराखंड वन सांख्यिकी पत्रिका पिछले आठ सालों से प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्थिति खुद वन विभाग की संवेदनहीनता पर सवाल खड़े करती है।
कोट...
जंगलों में खैर के पेड़ कम हो रहे हैं। यह चिंताजनक है। जंगल में खैर के पेड़ों की सुरक्षा की जानी चाहिए। वन कर्मियों को तस्करों के खिलाफ अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। - डॉ. साकेत बडोला, वन संरक्षक (पश्चिमी वृत्त)
इस साल कट गए इतने पेड़
वन प्रभाग कटे पेड़ मुकदमे
तराई केंद्रीय वन प्रभाग 95 65
तराई पूर्वी वन प्रभाग 80 55
तराई पश्चिमी वन प्रभाग 35 20
(स्रोत : वन विभाग के तीनों डिवीजन से प्राप्त आंकड़े)
प्रदेश के वन क्षेत्रों में प्रजातिवार वृक्षों का प्रतिशत
प्रजाति प्रतिशत
खैर 0.22
शीशम 0.58
देवदार 0.73
सागौन 0.78
यूकेलिप्टस 0.83
साल 12.10
बाज 14.81
चीड़ 15.25
(स्त्रोत : उत्तराखंड वन सांख्यिकी 2017-18)