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अब पता चलेगा किण्वन के बाद कितना बचा खमीर

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 06 Jul 2022 12:09 AM IST
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Now you will know how much yeast is left after fermentation
पंतनगर। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली के कुलपति डॉ. केपी सिंह ने तकनीक विकसित कर यह पता लगाया है कि डिस्टिलरी में किण्वन के बाद कितना खमीर बचा है। भारत सरकार ने इसे पेटेंट प्रदान किया है।
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डॉ. केपी सिंह की देखरेख में पंत विश्वविद्यालय की मेंब्रेन बायोफिजिक्स और नैनोटेक्नोलॉजी लैब में इस तकनीक का विकास किया गया है। इस तकनीक में खमीर कोशिकाओं की पहचान और व्यवहारिकता के लिए नैनोपोर आधारित इलेक्ट्रोकेमिकल नैनो बायोसेंसर बनाया है। शराब और बियर बनाने के लिए बड़े-बड़े रिएक्टरों में ग्रेन, शर्करा और खमीर (यीस्ट) फीड कर देते थे। इसके बाद तापमान, पीएच आदि का तो पता चल जाता था लेकिन खमीर की मॉनीटरिंग के लिए देश में कोई तकनीक नहीं होने से उसकी मात्रा का पता नहीं चल पाता था।
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शराब और बियर बनाने में खमीर ही प्रमुख तत्व है, जिसकी उचित मात्रा से ही उत्पाद की गुणवत्ता निर्धारित होती है। इस समस्या के निदान के लिए डिस्टिलरी वालों ने डॉ. सिंह से संपर्क किया और उनसे इसके लिए कोई तकनीक ईजाद करने को कहा। इसके बाद डॉ. सिंह और उनकी टीम ने तकनीक ईजाद करने के लिए नैनो तकनीक पर शोध कार्य शुरू किया। लगभग चार साल की मेहनत में नैनोपोर आधारित इलेक्ट्रोकेमिकल नैनो बायोसेंसर विकसित करने में सफलता हासिल कर ली गई है। वर्ष 2011 में इस तकनीक के पेटेंट के लिए डॉ. सिंह ने आवेदन किया था। लगभग 11 वर्ष बाद एक जुलाई को उन्हें इस तकनीक का पेटेंट हासिल हो गया है।
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ऐसे ईजाद हुई तकनीक
पंतनगर। नैनो यानी सूक्ष्म और पोर का मतलब होता है छेद। इस तकनीक में 30 नैनो मीटर का डिजाइन तैयार किया गया है। इस पर गोल्ड कोटिंग कर एंटीबॉडीज हीमोग्लाइज की गई। जैसे ही रिएक्टर के अंदर का मैटेरियल फिल्टर करके नैनो पोर से गुजारा गया तो उसने खमीर को पकड़ लिया। इससे सेंसर ने तत्काल सिग्नल दे दिया। इससे पता चलता है कि रिएक्टर में खमीर की कितनी वायबिलिटी है, कितना डेड हो गया और कितना जिंदा है। संवाद

कोट
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भारत सरकार देश में डिस्टिलरीज को बढ़ावा दे रही है, जिसके तहत पांच हजार डिस्टिलरी लगाने की योजना है। अब हाइब्रिड डिस्टिलरी आ रही हैं जो शुगर केन और ग्रेन को मिलाकर लीकर बना रही हैं। पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता में कमी आई है। वर्तमान में पेट्रोलियम पदार्थों में 20 प्रतिशत अल्कोहल मिलाई जाती है जिसे और बढ़ाने की कवायद हो रही है। ऐसे में इस तकनीक की खोज से पेट्रोलियम कंपनियों व डिस्टिलरीज को बहुत लाभ होगा और निकट भविष्य में पूंजी निवेश को आकर्षित करेगा। - डॉ. केपी सिंह, प्राध्यापक पंतनगर विवि
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