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चीड़ की पत्तियों से बायोचार बनाने की नई तकनीक
चंदन बंगारी, रुद्रपुर
Updated Sun, 08 Oct 2017 12:54 AM IST
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- फोटो : getty images
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पंतनगर। पहाड़ों के जंगलों की सेहत के लिए खतरनाक चीड़ के पत्तोंकी पत्तियों से बिना प्रदूषण फैलाए बायोचार बनाने की तकनीक विकसित की गई है। बायोचार के साथ ही सिन गैस, टिकली और बायो ऑयल भी तैयार किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को दावा है कि बायोचार में कृषि भूमि को उपजाऊ बनाने की क्षमता है। बायोचार को जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने के रूप में भी देखा जाता है।
अखिल भारतीय किसान मेले में जीबी पंत विश्वविद्यालय की फार्म मशीनरी एवं पावर इंजीनियरिंग विभाग के स्टॉल में रखी गई तकनीक ने खास तौर पर पर्वतीय क्षेत्रों से आए किसानों का ध्यान खींचा। वे इसके बारे में जानकारी हासिल करते रहे। विभाग के प्रमुख डॉ. टीके भट्टाचार्य ने बताया कि उत्तराखंड के अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत के जंगलों में चीड़ बड़ी समस्या है। अकेले उत्तराखंड में एक लाख हेक्टेयर में चीड़ मौजूद है।
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अब पंतनगर ने बायोचार बनाने की नई तकनीक विकसित की है। इस तकनीक पर आधारित संयंत्र की खासियत यह है कि बायोचार बनाने में अवशेष न के बराबर बचेगा और बनाने की प्रक्रिया में प्रदूषण भी न के बराबर होगा।
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अम्लीय मिट्टी में फसल नहीं उग पाती है। इसलिए ऐसी मिट्टी में बायोचार मिलाने से वह क्षारीय हो जाती है। इसके अलावा प्रिकेटिंग मशीन में उच्च दाब पर बायोचार से टिकली भी तैयार की जा सकती है। इसके लिए महज तीन से चार रुपये प्रति किलोग्राम टिकली का खर्च आता है। बायोचार के साथ गोबर मिलाकर भी टिकली तैयार की जाती है। टिकली का प्रयोग भट्टियां और अन्य जगहों पर किया जा सकता है। बताया कि चीड़ की पत्तियों को उच्च ताप पर जलाकर एक किलोग्राम पत्तियों से 250 एमएल बायो ऑयल भी मिलता है। इसका इस्तेमाल डीजल इंजन और भट्टियों में किया जा सकता है। इसके अलावा चीड़ की पत्तियों से बायोचार के साथ ही यंत्र से सिन गैस भी प्राप्त की जा सकती है। इस गैस को एकत्र कर इसका प्रयोग बर्नर, जनरेटर, इंजन और भट्टियों में किया जा सकता है। बताया कि इसका यंत्र महज तीन से चार हजार रुपये में तैयार हो जाता है।
बायोचार में मिट्टी को बांधे रखने की खासी क्षमता होती है। इस वजह से बायोचार को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भी मददगार माना जाता है। आक्सीजन की अनुपस्थिति में कम तापमान पर चीड़ की पत्तियों को जलाने से बायोचार बनता है।
चीड़ बटोरने को बनाया पंखे का रेक
पंतनगर। जंगलों में चीड़ की पत्तियां बटोरने में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए कांटेनुमा पंखे का रेक तैयार किया गया है। डॉ. भट्टाचार्य ने बताया कि रेक की सहायता से 100 किलोग्राम प्रति घंटा की दर से चीड़ की पत्तियां एकत्र की जा सकती हैं। चीड़ को एकत्र कर उसको घिर्री और रस्सी की मदद से पहाड़ से नीचे उतारा जा सकता है।
मोबाइल की बैटरी के लिए कार्बन भी मिलेगा
पंतनगर। डॉ. भट्टाचार्य ने बताया कि चीड़ से बायोचार इस नई तकनीक अच्छी गुणवत्ता का बायोचार तैयार हो जाता है। बताया कि अच्छे गुणवत्ता के बायोचार से मोबाइल की बैट्री के लिए कार्बन भी लिया जा सकता है। अभी इसमें शोध कार्य कार्य चल रहा है।