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2022 के विधानसभा चुनावों की पटकथा लिखी जा रही मेयर चुनाव में
आरडी खान
Updated Sun, 04 Nov 2018 01:06 AM IST
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काशीपुर मेयर का चुनाव वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की पटकथा लिखता दिखाई दे रहा है। भाजपा जहां अपना वर्चस्व कायम रखने की जद्दोजहद में जुटी है, वहीं कांग्रेस के सामने अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की चुनौती है। माना जा रहा है कि चुनाव परिणाम आने वाले विस चुनाव के लिए चेहरे तय करने में भी बड़ी भूमिका निभाएंगे। राजनैतिक गुणा-भाग में दलीय निष्ठाएं तक डोलती नजर आ रही हैं। विधायकी की दावेदारी करने वाले अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी की राह में अड़ंगा लगाते भी नजर आ रहे हैं।
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद भाजपा ने पहली बार वर्ष 2003 में निकाय चुनावों में पार्टी का सिंबल देने की शुरूआत की थी। भाजपा से पहली बार चुनाव जीतकर ऊषा चौधरी चेयरमैन चुनी गईं थीं। तब उन्हें निर्दलीय प्रत्याशी रोशनी बेगम ने टक्कर दी थी। वर्ष 2008 में टिकट न मिलने पर ऊषा बागी हो गईं और भाजपा प्रत्याशी राम मेहरोत्रा की हार का सबब बनीं। हालांकि उन्हें खुद भी बसपा के हाथों हार का स्वाद चखना पड़ा था। संगठन में खासी पैठ रखने वाले राम मेहरोत्रा इसके बाद से हमेशा ऊषा के विरोध में खड़े दिखाई दिए।
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वर्ष 2013 में भाजपा की जमानत जब्त कराकर पहली बार मेयर चुनी गईं ऊषा ने पार्टी नेतृत्व को संदेश दे दिया कि उनकी उपेक्षा पार्टी को मंहगी पड़ेगी। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 3059 मतों पर संतोष करना पड़ा था। दोनों बार भाजपा से बगावत करने वाली ऊषा के लिए मतों का ध्रुवीकरण वरदान साबित हुआ। दोनों बार जीते गए चुनाव ऊषा ने घासमंडी स्थित रामभवन से लड़े थे। यह भी इत्तफाक है कि वर्षों से रूठे राम (राम मेहरोत्रा) इस बार ऊषा चौधरी के साथ हैं, लेकिन भाजपा की सारी चुनावी गतिविधियां रामभवन से दूर है। उन्होंने बाजपुर रोड पर कार्यालय खोला है। उधर, रामभवन के आसपास की फिजा भी बदली हुई है। वहां केसरिया की जगह तिरंगे झंडों की भरमार है। वर्ष 2017 में भाजपा से बगावत कर विधायकी का चुनाव लड़ने वाले पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल की चुप्पी के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं। इस बदलाव को भी विरोध की राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है। हालांकि कार्यकर्ताओं के दंभ पर भाजपा प्रत्याशी ऊषा आत्मविश्वास से लबरेज दिखाई दे रही हैं।
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इससे इतर, पहली बार निकाय चुनाव में सक्रिय हुई कांग्रेस प्रत्याशी मुक्ता सिंह के सामने भी चुनौतियां कम नहीं है। उन्हें पार्टी के अंतर्विरोध से जूझने के साथ ही मतदाताओं के सामने खुद को साबित करना है। निगम में शामिल हुए देहात क्षेत्र के मुकाबले शहरी क्षेत्र के कांग्रेस का संगठन कुछ लचर माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस प्रत्याशी मुुक्ता अभी तक देहात क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय रही हैं। वर्ष 2017 के विस चुनाव में पार्टी का टिकट पाने की चाह रखने वाले नेता प्रत्याशियों की हार-जीत में अपना नफा नुकसान तोल रहे हैं। उन्हें यह डर भी सता रहा है कि चुनाव जीतने वाला प्रत्याशी आगे जाकर विधायकी के लिए ताल न ठोक दे। राजनैतिक दलों से जुड़े कार्यकर्ता तक सिंबल की बजाय अपनी निजी पसंद को तवज्जो देने की बातें करते देखे जा सकते हैं। फिलहाल किसान से लेकर व्यापारी तक दीपावली की तैयारियों में व्यस्त हैं। ऐसे में चुनाव प्रचार भी प्रभावित हो रहा है। जानकारों का मानना है कि दीपावली के बाद निकाय चुनाव अपनी रफ्तार पकड़ेगा और स्थिति और रोचक देखने को मिलेगी।