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Udham Singh Nagar News: हादसे में एक पैर गंवाया, अब बैडमिंटन से बढ़ा रहीं देश का मान
Fri, 20 Feb 2026 02:03 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Fri, 20 Feb 2026 02:03 AM IST
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रुद्रपुर। 23 वर्षीय उमा सरकार का जीवन यह बताने के लिए काफी है कि खेल केवल मैदान तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह जीवन से लड़ने का माध्यम भी बन सकता है। भूरारानी रोड स्थित शारदा कॉलोनी की रहने वाली उमा 2010 में एक रेल दुर्घटना का शिकार हुईं, जिसमें उन्होंने अपना एक पैर खो दिया।
समय के साथ उमा ने खुद को संभाला और बैडमिंटन के सहारे अपने भविष्य का रास्ता चुना। शुरुआती दौर में यह केवल अभ्यास था लेकिन धीरे-धीरे वही अभ्यास पहचान बन गया। राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार प्रदर्शन के बाद उमा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच बनाई। पिछले वर्ष नाइजीरिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन प्रतियोगिता में उमा ने सिंगल्स में दूसरा और डबल्स में तीसरा स्थान प्राप्त किया।
इसके बाद हाल ही में इजिप्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। सीमित संसाधनों के बावजूद यह उपलब्धि असाधारण मानी जा रही हैं। उमा का पारिवारिक जीवन बेहद साधारण है। पिता ई-रिक्शा चलाते हैं, मां घर संभालती हैं। पांच भाई-बहनों वाले परिवार में सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में लगे हैं। वर्तमान में उमा गुजरात के साईं प्रशिक्षण केंद्र में अभ्यास कर रही हैं लेकिन वहां तक पहुंचने की राह भी आसान नहीं रही।
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संसाधनों की कमी सबसे बड़ी चुनौती
खिलाड़ी का कहना है कि संसाधनों की कमी उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। एक आधुनिक कृत्रिम पैर के बिना उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं में निरंतर भागीदारी संभव नहीं हो पाती। डिसेबल्ड स्पोर्ट्स सोसाइटी के महासचिव हरीश चौधरी के अनुसार जिले में दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए न तो विशेषज्ञ कोच उपलब्ध हैं और न ही स्टेडियमों में आवश्यक सुविधाएं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाड़ी पूरी तरह आत्मनिर्भर संघर्ष के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
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समय के साथ उमा ने खुद को संभाला और बैडमिंटन के सहारे अपने भविष्य का रास्ता चुना। शुरुआती दौर में यह केवल अभ्यास था लेकिन धीरे-धीरे वही अभ्यास पहचान बन गया। राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार प्रदर्शन के बाद उमा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच बनाई। पिछले वर्ष नाइजीरिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन प्रतियोगिता में उमा ने सिंगल्स में दूसरा और डबल्स में तीसरा स्थान प्राप्त किया।
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इसके बाद हाल ही में इजिप्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। सीमित संसाधनों के बावजूद यह उपलब्धि असाधारण मानी जा रही हैं। उमा का पारिवारिक जीवन बेहद साधारण है। पिता ई-रिक्शा चलाते हैं, मां घर संभालती हैं। पांच भाई-बहनों वाले परिवार में सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में लगे हैं। वर्तमान में उमा गुजरात के साईं प्रशिक्षण केंद्र में अभ्यास कर रही हैं लेकिन वहां तक पहुंचने की राह भी आसान नहीं रही।
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संसाधनों की कमी सबसे बड़ी चुनौती
खिलाड़ी का कहना है कि संसाधनों की कमी उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। एक आधुनिक कृत्रिम पैर के बिना उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं में निरंतर भागीदारी संभव नहीं हो पाती। डिसेबल्ड स्पोर्ट्स सोसाइटी के महासचिव हरीश चौधरी के अनुसार जिले में दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए न तो विशेषज्ञ कोच उपलब्ध हैं और न ही स्टेडियमों में आवश्यक सुविधाएं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाड़ी पूरी तरह आत्मनिर्भर संघर्ष के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।