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पीली सतावर की खेती कर मुनाफा कमाएं
चंदन बंगारी रुद्रपुर।
Updated Sun, 09 Dec 2018 11:54 PM IST
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पंतनगर में सतावर की जड़ दिखाते वैज्ञानिक।
- फोटो : Amar ujala
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फसलों में लागत अधिक और मुनाफा कम होने को लेकर परेशान किसानों के लिए पीली सतावर की नई प्रजाति ‘सिम सुनहरी’ की खेती फायदे का सौदा बन सकती है। बाजार में काफी महंगी बिकने वाली सतावर की जड़ों का इस्तेमाल शक्तिवर्धक दवाओं के साथ ही दूध बढ़ाने में भी होता है। फलों के बगीचों और पापुलर, यूकेलिप्टिस के पेड़ों के बीच खाली जगहों पर सतावर की खेती की जा सकती है। मैदान के साथ ही पहाड़ों के काश्तकार भी सतावर की खेती कर मुनाफा कमा सकते हैं।
आमतौर पर मैदानी क्षेत्रों के किसान सफेद सतावर की खेती करते हैं, लेकिन सफेद सतावर का दाम बेहद कम मिलता है। पंतनगर स्थित केेंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्था अनुसंधान केंद्र (सीमैप) पीली सतावर की ‘सिम सुनहरी’ प्रजाति ईजाद कर चुका है। सफेद के मुकाबले बाजार में पीली सतावर की ज्यादा डिमांड होने से यह महंगे दामों में बिकती है। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. राकेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि अच्छी गुणवत्ता वाली पीली सतावर बाजार में पांच सौ से सात सौ रुपये प्रति किलोग्राम बिकती है। पीली सतावर की ‘सिम सुनहरी’ प्रजाति को वर्ष 2016 में सीमैप में ईजाद किया गया था।
बताया कि अप्रैल या मई में नर्सरी तैयार कर सतावर के बीज बोए जाते हैं और दो महीने में पौधे तैयार हो जाते हैं। जुलाई के अंतिम या अगस्त के पहले हफ्ते में पौधों की रोपाई होती है। उन्होंने बताया कि सतावर की जड़ें तैयार होने में दो वर्ष का वक्त लगता है और एक हेक्टेयर में 80 से 90 क्विंटल सूखी जड़ हासिल होती है। जड़ को उखाड़कर प्रोसेसिंग के बाद उसे बाजार में बेचा जाता है। बताया कि रेतीली, दोमट मिट्टी, पोरस पथरीली भूमि पर सतावर की खेती होती है।
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ऐसे होती है सतावर की खेती
रुद्रपुर। वैज्ञानिक डॉ. राकेश ने बताया कि एक हेक्टेयर जमीन में पांच किलोग्राम सतावर के बीज की जरूरत होती है। सीमैप में अच्छी गुणवत्ता का बीज चार हजार रुपये प्रति किलोग्राम मिल जाता है। सतावर के बीज से तैयार पौधों को लाइन से लाइन 70 सेंटीमीटर और पौधे से पौधा 50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाया जाता है। एक हेक्टेयर में 27 से 30 हजार पौधे लगाए जाते हैं। सतावर की खेती में किसान को एक हेक्टेयर में ढाई से तीन लाख खर्च करने होते हैं, जबकि उसे बेचकर 30 से 35 लाख का मुनाफा कमाया जा सकता है।
सतावर की मांग अधिक, थोड़ी मेहनत की जरूरत
रुद्रपुर। पीली सतावर की बाजार में काफी डिमांड है। लखनऊ, दिल्ली, बरेली, रामपुर, नीमच सहित अन्य जगहों की मंडी में सतावर बिकता है। सबसे अधिक नीमच, लखनऊ और दिल्ली की मंडी में इसकी बिक्री होती है। किसान अगर थोड़ी मेहनत करें तो सतावर की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
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आमतौर पर मैदानी क्षेत्रों के किसान सफेद सतावर की खेती करते हैं, लेकिन सफेद सतावर का दाम बेहद कम मिलता है। पंतनगर स्थित केेंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्था अनुसंधान केंद्र (सीमैप) पीली सतावर की ‘सिम सुनहरी’ प्रजाति ईजाद कर चुका है। सफेद के मुकाबले बाजार में पीली सतावर की ज्यादा डिमांड होने से यह महंगे दामों में बिकती है। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. राकेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि अच्छी गुणवत्ता वाली पीली सतावर बाजार में पांच सौ से सात सौ रुपये प्रति किलोग्राम बिकती है। पीली सतावर की ‘सिम सुनहरी’ प्रजाति को वर्ष 2016 में सीमैप में ईजाद किया गया था।
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बताया कि अप्रैल या मई में नर्सरी तैयार कर सतावर के बीज बोए जाते हैं और दो महीने में पौधे तैयार हो जाते हैं। जुलाई के अंतिम या अगस्त के पहले हफ्ते में पौधों की रोपाई होती है। उन्होंने बताया कि सतावर की जड़ें तैयार होने में दो वर्ष का वक्त लगता है और एक हेक्टेयर में 80 से 90 क्विंटल सूखी जड़ हासिल होती है। जड़ को उखाड़कर प्रोसेसिंग के बाद उसे बाजार में बेचा जाता है। बताया कि रेतीली, दोमट मिट्टी, पोरस पथरीली भूमि पर सतावर की खेती होती है।
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ऐसे होती है सतावर की खेती
रुद्रपुर। वैज्ञानिक डॉ. राकेश ने बताया कि एक हेक्टेयर जमीन में पांच किलोग्राम सतावर के बीज की जरूरत होती है। सीमैप में अच्छी गुणवत्ता का बीज चार हजार रुपये प्रति किलोग्राम मिल जाता है। सतावर के बीज से तैयार पौधों को लाइन से लाइन 70 सेंटीमीटर और पौधे से पौधा 50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाया जाता है। एक हेक्टेयर में 27 से 30 हजार पौधे लगाए जाते हैं। सतावर की खेती में किसान को एक हेक्टेयर में ढाई से तीन लाख खर्च करने होते हैं, जबकि उसे बेचकर 30 से 35 लाख का मुनाफा कमाया जा सकता है।
सतावर की मांग अधिक, थोड़ी मेहनत की जरूरत
रुद्रपुर। पीली सतावर की बाजार में काफी डिमांड है। लखनऊ, दिल्ली, बरेली, रामपुर, नीमच सहित अन्य जगहों की मंडी में सतावर बिकता है। सबसे अधिक नीमच, लखनऊ और दिल्ली की मंडी में इसकी बिक्री होती है। किसान अगर थोड़ी मेहनत करें तो सतावर की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।