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रूढ़िवादी सोच से उठें और अधिकारों के लिए एकजुट हों महिलाएं

Mon, 10 Dec 2018 12:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 10 Dec 2018 12:13 AM IST
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Get up from conservative thinking and unite for rights women
रुद्रपुर के धरमपुर गांव में अपराजिता कार्यक्रम के दौरान शपथ पत्रों के महिलाएं। - फोटो : amar ujala
अमर उजाला के अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स अभियान के तहत रविवार को रुद्रपुर ब्लॉक के धरमपुर गांव में महिला सशक्तीकरण पर पंचायत और कानूनी जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। इसमें 104 महिलाओं ने हिंसा और कानूनी अधिकारों के लिए आवाज उठाने की शपथ के साथ ही संकल्प पत्र भरे। 
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धरमपुर गांव के शिव मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में बाल विकास विभाग की सखी वन स्टॉप सेंटर की प्रशासक कविता बडोला ने कहा कि समाज में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2005 तक घरेलू हिंसा को हिंसा तक नहीं समझा जाता था। इसके बाद वर्ष 2005 में इस संबंध में अधिनियम बना और घरेलू हिंसा करने वालों पर कार्रवाई शुरू हुई।
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महिलाओं को आज भी घरों में दुपट्टा सही से डालने, पल्लू सही रखे की सीख दी जाती है लेकिन बैड टच के बारे में कोई नहीं सीखता। जरूरी है कि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग हों और आवाज उठाएं। सुचेतना समाजसेवा केंद्र की सुपरवाइजर सपना ने अपील की कि महिलाएं घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और छेड़छाड़ की घटनाओं को छुपाएं नहीं, खुलकर प्रतिकार करें। समाजसेवी शालिनी बोरा ने कहा कि महिलाओं के संरक्षण के लिए महिला आयोग जैसे कई संगठन हैं। सखी वन स्टॉप सेंटर की काउंसलर ममता कुशवाहा ने भी महिलाओं को प्रेरित किया। 
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अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम ने महिलाओं को जागरूक करने के लिए अच्छी पहल की है। जब तक महिलाओं को समाज और परिवार में उचित सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक देश प्रगति के पथ पर सही से आगे नहीं बढ़ सकेगा। 
- शालिनी बोरा, समाजसेवी 
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पिछले कुछ वर्षों में समाज में महिलाओं की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है। कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा का ग्राफ कुछ नीचे आया है। महिलाओं के सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं, जिनका साहस के साथ सामना किया जाना चाहिए। 
- सपना , सुपरवाइजर, सुचेतना समाज सेवा केंद्र 
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परिवार की मुख्य कड़ी बहू होती है। परिवार में बहू का पूरा सम्मान होना चाहिए। बहू और बेटी में किसी प्रकार का अंतर नहीं होना चाहिए। सरकार को पुरुषों के साथ महिलाओं के लिए भी रोजगार उपलब्ध कराना चाहिए।  
शांति चौधरी, ग्रामीण 
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समाज में पुत्र और पुत्री का भेदभाव खत्म होना चाहिए। निचले तबके में आज भी कुछ लोगों में बेटा और बेटी को लेकर भेदभाव की भावना है। लोगों को इस सोच से उबरकर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ में मदद करनी चाहिए। 
- सुनीता कुशवाह, ग्रामीण 
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मेरे दो बेटे और एक बेटी है। मैं तो अधिक न पढ़ सकी लेकिन बेटी को पूरी पढ़ाई कराने का प्रयास करूंगी ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी होकर आत्मनिर्भर बन सके। बेटियों का शिक्षित होना भी उतना ही जरूरी है, जितना बेटे का।  

- सरस्वती, ग्रामीण 
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समाज में अकेली रह रहीं महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय है। सरकार को अकेली महिलाओं के लिए कुछ कल्याणी योजनाएं लानी चाहिए, ताकि वह बुढ़ापे में सम्मानपूर्वक अपना जीवन गुजार सकें। 
- रेनू देवी, ग्रामीण 

 
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