पहल: तराई की धरती पर उगेगी आसमान की ताकत, DRDO किसानों को मुफ्त बीज देगा; उपज खरीदने की व्यवस्था भी होगी
तराई क्षेत्र में अब डीआरडीओ की प्रयोगशाला (डीआईबीईआर) सरसों जैसी दिखने वाली कैमोलिना फसल की खेती शुरू करने जा रही है, जिससे विमानों का ईंधन (बायो-जेट फ्यूल) तैयार किया जा सकेगा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
तराई के खेतों में अब सिर्फ अनाज और तिलहन ही नहीं बल्कि विमानों का ईंधन भी उगाने की तैयारी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशाला डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ बायो-एनर्जी रिसर्च (डीआईबीईआर) ने उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में कैमोलिना की खेती शुरू कराने जा रही है। सरसों की तरह दिखने और उगने वाली इस तिलहन फसल से विमान ईंधन तैयार किया जा सकता है।
किसानों की आय बढ़ाने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत विकसित करने के उद्देश्य से किसानों को कैमोलिना के बीज पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराए जाएंगे। डीआईबीईआर ने भारत में इस फसल को लाने और इसकी एग्रो-टेक्नोलॉजी को मानकीकृत करने की दिशा में काम किया है। तराई क्षेत्र में पहली बार कैमोलिना की खेती को महत्व दिया जा रहा है।
खास बात यह है कि किसानों को उपज बेचने के लिए बाजार पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। संस्थान ने उत्पादित बीज की बाय-बैक व्यवस्था की है। किसानों से कैमोलिना की उपज 140 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से वापस खरीदी जाएगी। इससे खेती शुरू करने वाले किसानों को बाजार भाव में उतार-चढ़ाव के जोखिम से भी राहत मिलने की उम्मीद है।
क्या है कैमोलिना... पांच प्वाइंट में समझें
बायोफ्यूल फसल: कैमेलिना (कैमेलिना सैटिवा) को संभावित बायोफ्यूल फसल माना जाता है। इससे विमानन क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला जेट फ्यूल तैयार किया जा सकता है।
कम उत्सर्जन: पारंपरिक पेट्रोलियम ईंधन की तुलना में इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 75 से 80 प्रतिशत तक कमी आने का दावा किया जाता है।
कम लागत और संसाधन: यह फसल अपेक्षाकृत कम समय में तैयार हो जाती है। इसकी खेती में अपेक्षाकृत कम लागत और संसाधनों की जरूरत होती है।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयोगी: इसकी विशेषताओं के कारण यह भारतीय हिमालयी क्षेत्र के पहाड़ी राज्यों के फसल चक्र के लिए उपयोगी मानी जाती है।
नया विकल्प : इस योजना के पीछे किसानों के लिए एक अतिरिक्त फसल विकल्प तैयार करने के साथ-साथ विमानन क्षेत्र के लिए वैकल्पिक ईंधन के स्रोत को बढ़ावा देना भी है।
इसमें डीआईबीईआर-डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की टीम अगले महीने प्रगतिशील किसानों से सीधे संवाद करेंगे। किसानों को कैमोलिना की खेती की तकनीक, बीज प्राप्त करने की प्रक्रिया और बाय-बैक अनुबंध से संबंधित जानकारी दी जाएगी। -डॉ. अनिल चंद्रा, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, काशीपुर