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बाल मजदूरी में खत्म हो रहा बचपन

Tue, 14 Nov 2017 12:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो रुद्रपुर। 
अमर उजाला ब्यूरो रुद्रपुर।  Updated Tue, 14 Nov 2017 12:46 AM IST
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Childhood ending in child labor
रुद्रपुर के गांधी पार्क में लगी ठेली से ग्राहक को खाना देने जाता बच्चा - फोटो : amar ujala

इंसान के लिए बचपन उसकी जिंदगी का सबसे नायाब पल होता है। बपचन में न किसी जिम्मेदारी का झंझट और न कोई चिंता रहती है, लेकिन कई मासूम ऐसे हैं, जो खेलने कूदने की उम्र में बाल श्रम करने को मजबूर है। ये बच्चे होटल, ढाबे, ठेलियों में काम करते और भीख मांगते आसानी से देखे जा सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारी अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे रहते हैं।

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बाल श्रम गंभीर समस्या बनता जा रहा है। परिवार की खराब हालत या अन्य कारणों से छोटी उम्र में ही बच्चे श्रम में जुट रहे हैं। कोई ढाबे में बर्तन धो रहा है तो कोई होटल में पानी और खाना ग्राहकों तक पहुंचा रहा है। इसके अलावा बच्चे वाहन मैकेनिक, खाने की ठेली, गाड़ी धोने, वाहनों में हवा भरने, कूड़ा बीनता हुआ आसानी से देखा जा सकता है। इन बच्चों की चिंता पढ़ाई की नहीं बल्कि मेहनताने को लेकर रहती है। ऐसे में बच्चों के भटकाव की स्थिति बनी रहती है और ये नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं। अमर उजाला ने जब काम करते हुए बच्चों से उनकी मजबूरी जाननी चाही तो कई तो बिना कुछ बोले काम में जुटे रहे और कुछ ने मजबूरियां साझा कीं।
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- किच्छा रोड स्थित एक ढाबे में काम कर रहे हरीश ने बताया कि वह हल्द्वानी का रहने वाला है। परिवार की माली हालत अच्छी नहीं होने की वजह से वह काम कर रहा है। काम करने की एवज में मिलने वाले रुपयों को घर में देता है। उसके पिता नहीं है। इसलिए चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने की वजह से उसे तीसरी कक्षा की पढ़ाई छोड़ने के बाद काम करना पड़ रहा है।
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- गांधी पार्क में एक होटल पर काम कर रहे राजू ने बताया कि उसका परिवार काफी गरीब है। पिता शराब पीते हैं। मां घरों में काम करती है। उसकी दो छोटी बहनें हैं। होटल से मिलने वाली तनख्वाह से बहनों की पढ़ाई का खर्च उठाता है।
- गांधी पार्क में एक ठेली से ग्राहक को खाना देने जा रहे पंकज ने बताया कि उसकी इच्छा पढ़ने की है, लेकिन घर के खराब हालात की वजह से उसे काम करना पड़ता है। काम नहीं करेगा तो पेट कैसे भरेगा।
- बाजार में भीख मांगने वाली बच्ची ने अपना नाम तो नहीं बताया, लेकिन कहा कि परिवार के बाकी लोग भी भीख मांगते हैं। पढ़ाई का नाम सुनकर वह हंसने लगी। बोली, पैसे दे दे, तभी तो पेट की भूख मिटेगी।
- सिब्बल सिनेमा रोड पर कूड़ा बीनने के साथ उसे बेचकर मिले रुपयों से नशा कर रहे किशोर ने कहा कि उसकी जिंदगी कूड़ा बीनने तक ही है। अगर कूड़ा नहीं बीनेगा तो खाने का सामान कैसे खरीदेगा। नशा करना तो उसकी जिंदगी के लिए जरूरी है।

जिले में पिछले साल चिन्हित हुए थे पांच बाल श्रमिक
बाल श्रम रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले श्रम विभाग की कार्यप्रणाली बेहद सुस्त है। इस साल अभी तक बाल श्रम का कोई आंकड़ा एएलसी दफ्तर में मौजूद नहीं है। पिछले साल पूरे जिले में पांच बाल श्रमिक चिन्हित कर उनका पुनर्वास किया गया था। वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 31 का था।


- एएलसी उम्मेद चौहान ने बताया बाल श्रम के एक्ट में अब संशोधन हो गया है। जिलास्तर पर डीएम की अध्यक्षता में एनसीएलपी कमेटी गठित की गई है। यही कमेटी भारत सरकार के बजट आने के बाद किसी एजेंसी से सर्वे कार्य कराएगी। कहा जिलों में   लेबर इंस्पेक्टर बाल श्रम को लेकर काम कर रहे हैं। हर नागरिक को अधिकार है कि वह बच्चे को श्रम करते देखे तो संबंधित संस्थान के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा सकता है।
- जिला प्रोबेशन अधिकारी वर्षा ने बताया बाल सुधार गृह में विभिन्न अपराधों में 10 बच्चे हैं। इन्हें सुधारने का प्रयास किया जाता है। बच्चों को पढ़ाने के साथ ही संगीत, योगा सहित अन्य गतिविधियां कराई जाती हैं।

- जागो संगठन के नवीन कहते हैं कि बाल श्रम पर कड़ाई से प्रतिबंध लगना चाहिए। उनका संगठन विद्यालय नहीं जाने वाले गरीब बच्चों को शिक्षित करने का काम करता है। नियमित रूप से ऐसे बच्चों के लिए रोजाना शाम को भदईपुरा, रम्पुरा में कक्षाएं चलती हैं। बाल श्रम रोकने के लिए जागरुकता जरूरी है।

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