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लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है गाजर घास
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गाजर घास के पौधे।
- फोटो : KASHIPUR
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काशीपुर। क्षेत्र में गाजर घास का फैलाव तेजी से हो रहा है। इसका बढ़ना स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक ये घास फसल उत्पादन को 30 से 40 फीसदी घटा देती है।
गाजर घास को चटक चांदनी, गंधी बूटी, पंथारी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यह शाकीय पौधा है। एक पौधे से हजारों बीज पैदा होते है, जो इस खरपतवार के फैलने में सहायक होते हैं। पत्ते गाजर या गुलदावरी जैसे होते हैं। पत्तियां कटावदार होती हैं। इसमें फूल सफेद रंग के होते हैं। इसमें फूल जल्दी आ जाते हैं और सात-आठ महीने तक खिले रहते हैं। इसका उपयोग गोबर के साथ गड्डे में डाल कर कंपोस्ट खाद और बॉयो गैस बनाने, कीट नाशक, कागज का उत्पादन आदि में काम आता है। गाजर घास के नियंत्रण के लिए फूल आने से पहले इसको काट कर या रसायन दवा का छिड़काव कर नष्ट किया जाता है। काशीपुर में बड़ी मात्रा में गाजर घास देखी जा सकती है।
गाजर घास मनुष्यों और फसलों के लिए हानिकारक है। इससे अस्थमा, चर्मरोग व कई प्रकार की एलर्जी होती है। यह विदेशी खरपतवार है, साठ के दशक में मैक्सिको से आयातित गेहूं के साथ भारत में आया है। इस समय देश में लगभग पांच लाख हेक्टेयर में फैला है। इससे फसल का उत्पादन 30-40 प्रतिशत घट जाता है। यह देश के हर भाग में मौजूद है। यह खाली मैदान, टहलने वाले स्थानों पर रास्तों के किनारे, खेल मैदानों और फसलों के साथ भी पैदा होता है। इसलिए फसलों की निराई में इसके पौधों को निकाल देना चाहिए। -डा. जितेन्द्र क्वात्रा,
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गाजर घास को चटक चांदनी, गंधी बूटी, पंथारी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यह शाकीय पौधा है। एक पौधे से हजारों बीज पैदा होते है, जो इस खरपतवार के फैलने में सहायक होते हैं। पत्ते गाजर या गुलदावरी जैसे होते हैं। पत्तियां कटावदार होती हैं। इसमें फूल सफेद रंग के होते हैं। इसमें फूल जल्दी आ जाते हैं और सात-आठ महीने तक खिले रहते हैं। इसका उपयोग गोबर के साथ गड्डे में डाल कर कंपोस्ट खाद और बॉयो गैस बनाने, कीट नाशक, कागज का उत्पादन आदि में काम आता है। गाजर घास के नियंत्रण के लिए फूल आने से पहले इसको काट कर या रसायन दवा का छिड़काव कर नष्ट किया जाता है। काशीपुर में बड़ी मात्रा में गाजर घास देखी जा सकती है।
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गाजर घास मनुष्यों और फसलों के लिए हानिकारक है। इससे अस्थमा, चर्मरोग व कई प्रकार की एलर्जी होती है। यह विदेशी खरपतवार है, साठ के दशक में मैक्सिको से आयातित गेहूं के साथ भारत में आया है। इस समय देश में लगभग पांच लाख हेक्टेयर में फैला है। इससे फसल का उत्पादन 30-40 प्रतिशत घट जाता है। यह देश के हर भाग में मौजूद है। यह खाली मैदान, टहलने वाले स्थानों पर रास्तों के किनारे, खेल मैदानों और फसलों के साथ भी पैदा होता है। इसलिए फसलों की निराई में इसके पौधों को निकाल देना चाहिए। -डा. जितेन्द्र क्वात्रा,
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