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सोमवार के साथ प्रदोष और नाग पंचमी का बन रहा दुर्लभ संयोग

Mon, 15 Jul 2019 10:24 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 15 Jul 2019 10:24 PM IST
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Rare coincidence of Monday and Nag Panchami
चंबा (टिहरी)। देवों के देव महादेव का प्रिय सावन का महीना 17 जुलाई से शुरू हो रहा है। इस बार सावन में चार सोमवार आएंगे। 29 जुलाई को सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का दुर्लभ संयोग बन रहा है। वहीं पांच अगस्त को सोमवार और नाग पंचमी के संयोग का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि सावन में भगवान शिव के पूजन-अर्चना से भोले बाबा की कृपा बरसती है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शंकर का महीना माना जाता है। शिव का अर्थ कल्याण है। कहा जाता है कि कण-कण में भगवान शिव का वास है। वेदों में उनका साकार और निराकार का वर्णन किया गया है। भगवान शिव क्षण में ही पसीज कर भक्तों को अभय प्रदान करते हैं। सावन का महीना 17 जुलाई बुधवार से शुरू हो रहा है। सावन में सोमवार को भगवान शिव की पूजा अत्यधिक फलदायी मानी जाती है। सावन शुरू होते ही जगह-जगह बोल बम के नारे गूंजने लगते हैं। इस बार सावन में कुल चार सोमवार का संयोग बन रहा है। इसमें 22 जुलाई, 29 जुलाई, 5 अगस्त और 12 अगस्त को सावन का आखिरी सोमवार पड़ेगा। सावन के दूसरे सोमवार 29 जुलाई को आ रहे प्रदोष व्रत के साथ अमृत सर्वार्थ सिद्धि का विशेष योग बन रहा है। तीसरे सोमवार 5 अगस्त को आ रही नाग पंचमी का फल भी शुभदायक है। सावन की शिवरात्रि 30 जुलाई मंगलवार को मनाई जाएगी। विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट के अनुसार सोमवार को प्रदोष व्रत और नागपंचमी का योग श्रेष्ठ होता है। बताया कि सावन में भगवान शिव का अभिषेक किया जाना चाहिए।
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भगवान नटराज के डमरू से निकला व्याकरण शास्त्र
भगवान शिव ने नृत्य करके डमरू बजाया। डमरू के बोल से 14 सूत्र निकले। महर्षि पाणिनी ने भगवान शिव की कृपा से इन्हीं डमरू के बोलों (सूत्रों) से व्याकरण शास्त्र की रचना की। इस प्रकार चौदह सूत्रों से वर्णमाला प्रकट हुई। डमरू को चौदह बार बजाने से 14 सूत्रों के रूप में निकली ध्वनियों से ही व्याकरण का प्राकट्य हुआ। इसलिए व्याकरण सूत्रों के आदि प्रवर्तक भगवान नटराज को कहा जाता है।
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शिवजी के आभूषणों का रहस्य
भगवान शिव के सिर पर स्थित चंद्रमा अमृत का द्योतक है। गले में लिपटा सर्प काल का प्रतीक है। इस सर्प अर्थात काल को वश में करने से ही शिव मृत्युंजय कहलाए। उनके हाथों में स्थित त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैहिक, दैविक और भौतिक के विनाश का सूचक है। उनके वाहन नंदी धर्म का प्रतीक हैं। हाथों में डमरू ब्रह्म निनाद का सूचक है।
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