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सोमवार को श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि के दुर्लभ संयोग
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चंबा (टिहरी)। महाशिवरात्रि फाल्गुन की चतुर्दशी को मनाया जाता है, लेकिन इस साल चतुर्दशी तिथि चार और पांच मार्च को दो दिन आने से पर्व की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बन रही है। ज्योतिषियों का कहना है कि निशिथ व्यापिनी युक्त चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पूजन किया जाना शास्त्र सम्मत है। ऐसे में इस बार चार मार्च को महाशिवरात्रि सोमवार को श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग के दुर्लभ संयोग में आने से विशेष कल्याणकारी मानी जा रही है।
सालभर में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है, लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस साल सोमवार को शाम 4.30 बजे से चतुर्दशी तिथि लग रही है, जो पांच मार्च को शाम छह बजे तक रहेगी। ऐसे में लोगों में महाशिवरात्रि पर्व की तिथि को लेकर दुविधा है। शास्त्र-पुराणों की मान्यता के अनुसार निशिथ व्यापिनी (रात के चार पहर) युक्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का व्रत पूजन किया जाना चाहिए। सनातन हिंदू धर्म में दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में आठ पहर होते हैं। औसतन एक पहर तीन घंटे का होता है। इसमें से चार पहर दिन और चार रात के होते हैं। इस स्थिति में सूर्यास्त के बाद चतुर्दशी तिथि के योग में चार पहर की पूजा चार मार्च को की जाएगी। सोमवार भगवान शिव का दिन है। इस दिन श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था। उत्तराखंड विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट ने बताया कि शास्त्रानुसार निशिथ व्यापिनी और चतुर्दशी युक्त महाशिवरात्रि को ग्राह्य बताया गया है।
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सालभर में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है, लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस साल सोमवार को शाम 4.30 बजे से चतुर्दशी तिथि लग रही है, जो पांच मार्च को शाम छह बजे तक रहेगी। ऐसे में लोगों में महाशिवरात्रि पर्व की तिथि को लेकर दुविधा है। शास्त्र-पुराणों की मान्यता के अनुसार निशिथ व्यापिनी (रात के चार पहर) युक्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का व्रत पूजन किया जाना चाहिए। सनातन हिंदू धर्म में दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में आठ पहर होते हैं। औसतन एक पहर तीन घंटे का होता है। इसमें से चार पहर दिन और चार रात के होते हैं। इस स्थिति में सूर्यास्त के बाद चतुर्दशी तिथि के योग में चार पहर की पूजा चार मार्च को की जाएगी। सोमवार भगवान शिव का दिन है। इस दिन श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था। उत्तराखंड विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट ने बताया कि शास्त्रानुसार निशिथ व्यापिनी और चतुर्दशी युक्त महाशिवरात्रि को ग्राह्य बताया गया है।
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