{"_id":"5ada20314f1c1b56098b585c","slug":"15242445307-new-tehri-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"देश की एकता के लिए मठों की स्थापना की","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
देश की एकता के लिए मठों की स्थापना की
Updated Fri, 20 Apr 2018 10:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंबा (टिहरी)। देशभर में चार मठों और अद्वैत वेदांत की ओर से जगद्गुरु शंकराचार्य की जयंती धूमधाम से मनाई गई। वक्ताओं ने कहा कि समाज में पापाचार, विलासिता, भौतिक कामनाओं का बोलबाला जैसी समस्याओं के खात्मे के लिए जगद्गुरु के उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया जाना जरूरी है।
शुक्रवार को नगर में आयोजित कार्यक्रम में आद्य शंकराचार्य की मूर्ति पर लोगों ने माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वक्ताओं ने कहा कि विश्वभर में जिन अद्वितीय भारतीय दार्शनिकों ने सनातन धर्म को पुन: प्रतिष्ठित किया, उनमें आद्य शंकराचार्य निसंदेह सर्वोपरि हैं। उन्होंने मात्र 32 वर्ष के कुल जीवन में संपूर्ण भारत में पैदल चलकर देश को एक सूत्र में बांधने के लिए उत्तर में ज्योतिर्मठ, पूरब में गोवर्द्धनमठ, पश्चिम में शारदामठ और दक्षिण में श्रृंगेरीमठ की स्थापना की।
इंद्रपाल सिंह परमार ने कहा कि आचार्य शंकर ने संसार को माया और मिथ्या बताया है, लेकिन उनका यह मानना बिल्कुल नहीं था कि संसार को माया मानकर भाग जाओ या कर्म ही न करो। उनका भाव तो यह था कि व्यावहारिक जीवन में संसार के कर्तव्यानुसार अच्छे कर्मों को करते हुए जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करो। मोहन सिंह कुर्माइं ने कहा कि आदि गुरु सही मायनों में भारतवर्ष के मानचित्र के पहले चितेरे थे, जिन्होंने पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक देश की सीमाओं का अंकन किया। इस मौके पर मोहनलाल सेमवाल, ओमप्रकाश कोठारी, प्यार सिंह भंडारी, मनोहर लाल रतूड़ी, पीतांबर नौटियाल आदि मौजूद थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
शुक्रवार को नगर में आयोजित कार्यक्रम में आद्य शंकराचार्य की मूर्ति पर लोगों ने माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वक्ताओं ने कहा कि विश्वभर में जिन अद्वितीय भारतीय दार्शनिकों ने सनातन धर्म को पुन: प्रतिष्ठित किया, उनमें आद्य शंकराचार्य निसंदेह सर्वोपरि हैं। उन्होंने मात्र 32 वर्ष के कुल जीवन में संपूर्ण भारत में पैदल चलकर देश को एक सूत्र में बांधने के लिए उत्तर में ज्योतिर्मठ, पूरब में गोवर्द्धनमठ, पश्चिम में शारदामठ और दक्षिण में श्रृंगेरीमठ की स्थापना की।
विज्ञापन
इंद्रपाल सिंह परमार ने कहा कि आचार्य शंकर ने संसार को माया और मिथ्या बताया है, लेकिन उनका यह मानना बिल्कुल नहीं था कि संसार को माया मानकर भाग जाओ या कर्म ही न करो। उनका भाव तो यह था कि व्यावहारिक जीवन में संसार के कर्तव्यानुसार अच्छे कर्मों को करते हुए जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करो। मोहन सिंह कुर्माइं ने कहा कि आदि गुरु सही मायनों में भारतवर्ष के मानचित्र के पहले चितेरे थे, जिन्होंने पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक देश की सीमाओं का अंकन किया। इस मौके पर मोहनलाल सेमवाल, ओमप्रकाश कोठारी, प्यार सिंह भंडारी, मनोहर लाल रतूड़ी, पीतांबर नौटियाल आदि मौजूद थे।
विज्ञापन