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युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बने कौशल गांव के सचपाल भंडारी
Updated Sun, 07 Jan 2018 10:38 PM IST
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कंडीसौड़ (टिहरी)। मुंबई की चकाचौंध का मोह त्याग कर सचपाल सिंह भंडारी स्वरोजगार के लिए गांव लौट आए हैं। हल्दी और मसरूम का उत्पादन कर वह युवाओं को स्वरोजगार की नई राह दिखा रहे हैं। मसरूम की डिमांड इतनी बढ़ गई कि वह उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
इंटर की पढ़ाई करने के बाद थौलधार ब्लॉक के कौशल गांव निवासी सचपाल सिंह भंडारी नौकरी की तलाश में वर्ष 2007 में मुंबई पहुंचे। तीन साल तक प्रोडेक्शन हाउस में कैमरामैन की नौकरी की। प्रति माह 16 हजार वेतन मिलता था, जो परिवार के भरण पोषण के लिए पूरा नहीं हो पाता था। वर्ष 2011 में नौकरी छोड़कर वह गांव लौट आए। बंजर पड़ी 20 नाली खेती को आबाद करने के लिए गेंती और फावड़ा उठाया। सालभर हाड़तोड़ मेहनत कर बंजर खेती को उन्होंने हल्दी की खेती करने लायक बनाया। तब से प्रतिवर्ष वह 150 से 200 क्विंटल तक हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। सालभर में वह हल्दी से एक लाख तक की आमदनी अर्जित कर लेते है, लेकिन हल्दी की बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध न होने पर उन्हें ऋषिकेश या देहरादून की मंडी में जाना पड़ता है।
इस वर्ष उन्होंने पहली बार मसरूम उत्पादन में हाथ अजमाया, तो कारोबार खूब चल पड़ा। प्रतिदिन वह अपने घर में 12 से 15 किलो मसरूम उत्पादन कर रहे हैं। क्षेत्र में मसरूम की डिमांड इतनी है कि उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं। जड़ी बूटी शोध संस्थान की मदद से उन्होंने इस वर्ष बड़ी इलायची और चंदन के पौधे भी लगाए हैं। भंडारी ने बताया कि इलायची की ग्रोथ भी धीरे-धीरे ठीक हो रही है।
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इंटर की पढ़ाई करने के बाद थौलधार ब्लॉक के कौशल गांव निवासी सचपाल सिंह भंडारी नौकरी की तलाश में वर्ष 2007 में मुंबई पहुंचे। तीन साल तक प्रोडेक्शन हाउस में कैमरामैन की नौकरी की। प्रति माह 16 हजार वेतन मिलता था, जो परिवार के भरण पोषण के लिए पूरा नहीं हो पाता था। वर्ष 2011 में नौकरी छोड़कर वह गांव लौट आए। बंजर पड़ी 20 नाली खेती को आबाद करने के लिए गेंती और फावड़ा उठाया। सालभर हाड़तोड़ मेहनत कर बंजर खेती को उन्होंने हल्दी की खेती करने लायक बनाया। तब से प्रतिवर्ष वह 150 से 200 क्विंटल तक हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। सालभर में वह हल्दी से एक लाख तक की आमदनी अर्जित कर लेते है, लेकिन हल्दी की बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध न होने पर उन्हें ऋषिकेश या देहरादून की मंडी में जाना पड़ता है।
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इस वर्ष उन्होंने पहली बार मसरूम उत्पादन में हाथ अजमाया, तो कारोबार खूब चल पड़ा। प्रतिदिन वह अपने घर में 12 से 15 किलो मसरूम उत्पादन कर रहे हैं। क्षेत्र में मसरूम की डिमांड इतनी है कि उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं। जड़ी बूटी शोध संस्थान की मदद से उन्होंने इस वर्ष बड़ी इलायची और चंदन के पौधे भी लगाए हैं। भंडारी ने बताया कि इलायची की ग्रोथ भी धीरे-धीरे ठीक हो रही है।
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