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संतों में जल समाधि की बजाए भू-समाधि की चाह
Updated Tue, 24 Oct 2017 10:26 PM IST
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चंबा (टिहरी)। नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण से चिंतित संत समाज अब परंपरा तोड़कर जल-समाधि के बजाए भू-समाधि ग्रहण करना चाहते हैं। मगर भू-समाधि के लिए साधु समाज सरकार से पर्याप्त भूमि भी चाहते हैं। संतों का मानना है कि जल-समाधि के कारण जलीय पर्यावरण में समस्या पैदा हो रही है।
गंगा को प्रदूषित होने से रोकने के लिए संतों ने अपने स्तर से उपाय करने शुरू कर दिए हैं। संन्यासियों की सनातनी परंपरा में जल समाधि को त्यागने का फैसला हो गया है। संन्यासी परंपरा में जल एवं भू समाधि दी जाती है। इसमें साधु को पदमासन की मुद्रा में बैठाकर जल या जमीन में समाधि दी जाती है। भू-समाधि लेने के फैसले से संतों के समक्ष भूमि की समस्या खड़ी हो गई है। क्योंकि संतों के पास भू समाधि के लिए पर्याप्त मात्रा में भूमि उपलब्ध नहीं है। तीर्थ रक्षा सम्मान समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगी राकेश नाथ का कहना है कि गंगा की पवित्रता और स्वच्छता के लिए साधु-संत भू समाधि लेने के लिए तैयार हैं। मगर इसके लिए सरकार को भूमि भी उपलब्ध करानी चाहिए। टपकेश्वर महादेव मंदिर के महंत स्वामी किशन गिरी महाराज का कहना है कि संतों की भू समाधि के लिए जमीन की मांग पर्यावरण के हित में है। कहा कि सरकार को गंगा को बचाने के लिए हिंदू संतों के भू-समाधि के लिए भूमि देनी चाहिए। भारत माता मंदिर के महंत स्वामी ललितानंद गिरी का कहना है कि जल समाधि का उद्देश्य यह है कि साधुओं का शरीर मृत्यु से पहले और मौत के बाद दूसरों के कल्याण के काम में आए। मृत्यु के बाद साधु का शरीर जल के जीव-जंतुओं का आहार बने, मगर नदियों में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए भू-समाधि दी जानी चाहिए। बशर्ते सरकार इसके लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराए।
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गंगा को प्रदूषित होने से रोकने के लिए संतों ने अपने स्तर से उपाय करने शुरू कर दिए हैं। संन्यासियों की सनातनी परंपरा में जल समाधि को त्यागने का फैसला हो गया है। संन्यासी परंपरा में जल एवं भू समाधि दी जाती है। इसमें साधु को पदमासन की मुद्रा में बैठाकर जल या जमीन में समाधि दी जाती है। भू-समाधि लेने के फैसले से संतों के समक्ष भूमि की समस्या खड़ी हो गई है। क्योंकि संतों के पास भू समाधि के लिए पर्याप्त मात्रा में भूमि उपलब्ध नहीं है। तीर्थ रक्षा सम्मान समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगी राकेश नाथ का कहना है कि गंगा की पवित्रता और स्वच्छता के लिए साधु-संत भू समाधि लेने के लिए तैयार हैं। मगर इसके लिए सरकार को भूमि भी उपलब्ध करानी चाहिए। टपकेश्वर महादेव मंदिर के महंत स्वामी किशन गिरी महाराज का कहना है कि संतों की भू समाधि के लिए जमीन की मांग पर्यावरण के हित में है। कहा कि सरकार को गंगा को बचाने के लिए हिंदू संतों के भू-समाधि के लिए भूमि देनी चाहिए। भारत माता मंदिर के महंत स्वामी ललितानंद गिरी का कहना है कि जल समाधि का उद्देश्य यह है कि साधुओं का शरीर मृत्यु से पहले और मौत के बाद दूसरों के कल्याण के काम में आए। मृत्यु के बाद साधु का शरीर जल के जीव-जंतुओं का आहार बने, मगर नदियों में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए भू-समाधि दी जानी चाहिए। बशर्ते सरकार इसके लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराए।
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