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तीन वर्ष बाद भी थमने को नहीं आंसू
ब्यूरो/अमर उजाला रुद्रप्रयाग
Updated Wed, 15 Jun 2016 10:39 PM IST
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द्वि दिन पैल फोन ऐ छौ, मां मी 18 जून तै घौर आणू छौ, नौनौ तै काफी-किताब और स्कूले ड्रेस खरीदें तैं फिर केदारनाथ वापस चली जालू.. क्या पता कभी तै बौडी आलू.. इन शब्दों को पूरा करने से पहले ही एक वृद्ध मां फफक-फफक कर रो पड़ी।
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आपदा में बेटों खो चुकी मां के आंसू तीन वर्ष गुजर जाने के बाद भी थमने को नहीं है। यह स्थिति केदारघाटी के आपदा प्रभावित एक गांव के एक घर का नहीं, बल्कि देवलीभणिग्राम, लमगौंडी, बडासू, रुद्रपुर, देवर, खुन्नू आदि गांवों में उन घरों का है, जिन्होंने एक नहीं तीन-तीन पीढ़ियों को आपदा में खो दिया। आज प्रभावित कमर कसकर खड़े तो हो रहे हैं, लेकिन उनके आंसू थमने को नहीं हैं।
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16/17 जून 2013 की आपदा ने केदारनाथ व केदारघाटी के भूगोल को हीं नहीं बदला, वहां के जनजीवन को भी हाशिए पर ला दिया था। अकेले दिवलीभणिग्राम के 54, लमगौंडी 20 से अधिक और बडासू में 23 लोग आपदा में काल का ग्रास बन गए थे, जिनमें एक ही परिवार के पांच से सात सदस्य भी मौजूद थे।
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केदारघाटी के केदारनाथ से जुड़े तीर्थ पुरोहित यात्रा शुरू होने के बाद जून तीसरे सप्ताह में अपने घरों को लौटते हैं और कुछ दिन घर में रहने के बाद वे पुन: धाम लौटते हैं। वर्ष 2013 में भी अधिकांश अपने घरों को लौटने की तैयारी में थे, लेकिन काल को यह मंजूर नहीं था।
दिवलीभणिग्राम के गणेश तिवारी, लमगौंडी के दिनेश बगवाड़ी आदि का कहना है कि आपदा से पूर्व इन दिनों जिन घरों में रौनक हुआ करती थी, वहां तीन वर्ष से सन्नाटा पसरा हुआ है। बुजुर्ग माता-पिता हो चाहे छोटे भाई बहन या फिर मासूम बच्चे, हर किसी को खोए अपनों का इंतजार है।
दिन तो जैसे-तैसे कामकाज में व्यतीत हो रहा है, लेकिन बेटे, पिता, चाचा, ताऊ, भाई, पति, पोते की याद में दिन-रात रोते-रोते कट रही है। इधर, देवलीभणिग्राम में मंदाकिनी बुनकर समिति द्वारा प्रभावित महिलाओं को बुनकर का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।