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बुरूवा-विसुड़ीताल की ट्रैकिंग कर लौटा दस्ता

Wed, 02 Jun 2021 07:16 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Wed, 02 Jun 2021 07:16 PM IST
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The squad returned after tracking Buruva-Visudital
मद्महेश्वर घाटी के रांसी गांव का सात सदस्यीय दल बुरूवा-विसुड़ीताल की ट्रैकिंग कर लौट आया है। वन्य जीव व पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ वहां दल ने प्राकृतिक सौंदर्य का भी दीदार किया।
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रांसी गांव निवासी हरेंद्र खोयाल के नेतृत्व में ये दल बीते शुक्रवार को ट्रैकिंग के लिए रवाना हुआ था। बुरूवा से दस किमी खड़ी चढ़ाई पार करते हुए यह दल टिंगरी बुग्याल पहुंचा। वहां रात्रि प्रवास के बाद अगले दिन सुबह आगे बढ़ा और दस किमी दूरी तय कर बिसुड़ताल पहुंचा। दल वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया। सोन पर्वत की तलहटी पर हरे-भरे बुग्याल के बीच स्थित बिसुडीताल ताल अपनी रचना और महत्व को लेकर विशेष स्थान रखता है।
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दल में शामिल ऋषिराज खोयाल, विपिन राणा, कैलाश पंवार, अखिलेश बत्र्वाल, दीपक बिष्ट और विपिन राणा ने बताया कि मीलों फैले बुग्यालों के बीच बिसुडीताल का सौंदर्य देखते ही बनता है। इन दिनों चारों तरफ फैली हरियाली के बीच रंग-बिरंगे कई प्रजाति के फूल खिले हुए हैं। बिसुडीताल के ऊपरी छोर की चोटी सोनपुर के नाम से प्रसिद्ध है। ताल के सबसे ऊंचाई वाले भाग से एक तरफ से द्वितीय केदार मद्महेश्वर व दूसरे भाग से तृतीय केदार तुंगनाथ के दर्शन होते हैं। उन्होंने बताया कि चोपता-तुंगनाथ-बिसुड़ीताल, सारी- देवरियाताल-बिसुडीताल और बुरूवा-बिसुडीताल ट्रैकिंग रूट से यहां पहुंचा जा सकता है। भले ही तीनों ट्रैकिंग रूट पर कई जगह खड़ी चढ़ाई है जिस कारण पर्यटकों को खासी दिक्कतें हो रही हैं। बावजूद यहां पर्यटन व एडवेंचर की अपार संभावनाएं हैं जो कई परिवारों की आर्थिकी का जरिया भी बन सकती हैं। जरूरत है कि शासन, प्रशासन व संबंधित विभाग इस दिशा में ठोस कार्ययोजना तैयार करें। मान्यता है कि बिसुड़ीताल की उत्पत्ति भगवान विष्णु ने की है। जिला पर्यटन अधिकारी सुशील नौटियाल का कहना है एडवेंचर व पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चरणबद्ध योजना बनाई जा रही है। इसके लिए सभी प्राचीन ट्रैकों की जीएसआई मैपिंग की जा रही है।
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