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छात्र राजनीति की धार कुंद, आमसभा के प्रति छात्रों का मोह भंग
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कमलेंदु सेमवाल
- फोटो : RUDRAPUR
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चंदन बंगारी
रुद्रपुर। राजनीति की पहली सीढ़ी माने जाने वाली छात्र राजनीति को लेकर विद्यार्थियों का उत्साह फीका पड़ने लगा है। शनिवार को एसबीएस डिग्री कॉलेज में शनिवार को होने वाली आम सभा में प्रत्याशियों और विद्यार्थियों का नहीं पहुंचना इसका ताजा उदाहरण है।
लिंगदोह समिति की सिफारिशों के चलते एक दशक तक बंद रही आम सभा फिर से शुरू तो की गई लेकिन लगातार दूसरे साल भी आम सभा में प्रत्याशी और विद्यार्थियों के नहीं पहुंचने से इसे रद्द करना पड़ा। किसी दौर में आम सभा के दिन विद्यार्थियों के भरा रहने वाले कॉलेज में सन्नाटा ही पसरा रहा। यह हालात छात्र राजनीति की कुंद होती धार को भी बयां करते हैं।
दरअसल छात्रसंघ चुनाव में आम सभा का बड़ा महत्व होता था। आम सभा में अपनी बात को प्रखरता से रखकर विद्यार्थियों को रिझाने वाला ही अध्यक्ष और अन्य पदों में चुना जाता था। आम सभा में कई बार प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच हुए विवादों के चलते इसे बंद करना पड़ा लेकिन छात्रों की मांग के चलते आम सभा शुरू और बंद भी की गई थी।
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आमसभा में प्रखरता से बात रखकर पदाधिकारी चुने गए कई नेता वर्तमान में सियासत के बड़े चेहरे हैं। चार बार अध्यक्ष रहे राजकुमार ठुकराल रुद्रपुर से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। इसी कॉलेज की छात्र राजनीति में पैर जमाकर अध्यक्ष बने राजेश शुक्ला भी दूसरी बार किच्छा के विधायक हैं। इसके अलावा तमाम ऐसे चेहरे हैं, जो छात्र राजनीति से उभरकर अपने क्षेत्र में पहचान बनाए हुए हैं। लेकिन बदलते दौर में अब आमसभा में बात रखने तक में प्रत्याशी कतराते हैं।
स्थिति यह हो गई है कि पिछले चुनाव में तो सभी दावेदारों ने एकमत होकर आम सभा नहीं कराने का अनुरोध किया था। यह कहा जा सकता है कि अब छात्रसंघ चुनाव सिर्फ हो हुल्लड़ और औपचारिकता तक ही सीमित है। दावेदारों के पास विजन ही नहीं है। छात्र नेता जब छात्रों के सामने ही बोलने से कतराएंगे तो सरकार और वीसी के सामने कैसे अपनी बात रख पाएंगे।
वर्ष 1995 में हुए छात्र संघ चुनाव में मेरे प्रयासों से आमसभा हुई थी लेकिन विपक्षियों ने माइक तोड़ दिया था। तब मैंने बिना माइक के विद्यार्थियों को संबोधित किया था और अध्यक्ष चुना गया था। आमसभा में प्रत्याशी के भाषण से विद्यार्थी उसके विजन और क्षमता परखते थे। सभा में विद्यार्थियों की भी काफी भीड़ रहती थी। अब तो चुनाव धनबल में सिमट गया है। - राजेश शुक्ला, विधायक किच्छा (अध्यक्ष 1995-96)।
अब छात्र संघ चुनाव औपचारिकता भर रह गया है। हमारे समय में पहले आमसभा का विद्यार्थियों को इंतजार रहता था। मैं तीन बार चुनकर और एक बार मनोनीत अध्यक्ष रहा था। तब प्रत्याशी का भाषण ही वोटरों को प्रभावित करता था। अब राजनीति सिर्फ चुनाव तक की सिमट गई है। विद्यार्थी भी आम सभा में आना पसंद नहीं करते हैं। - राजकुमार ठुकराल, विधायक रुद्रपुर (अध्यक्ष 1989 से 1993)।
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पहले चुनाव में दावेदारों के बीच भाषण की प्रतिस्पर्धा होती थी। अपने भाषण में प्रभावी मुद्दे रखने वाला अध्यक्ष चुना जाता था। सालभर विद्यार्थियों को आम सभा का इंतजार रहता था और आमसभा में काफी भीड़ हुआ करती थी। कॉलेज प्रशासन के बजाय दावेदारों के अपने-अपने भाषण के मंच होते थे। अब तो चुनाव मुद्दा विहीन हो चुके हैं। - कमलेंद्र सेमवाल, (छात्र संघ अध्यक्ष 1993-94)।
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आम सभा के प्रति पहले खासा क्रेज होता था। विद्यार्थियों के अलावा बाहर के लोग भी प्रत्याशी का भाषण सुनने पहुंचते थे। मुद्दों पर भाषण होते थे और छात्र हितों की आवाज उठाने के लिए एकजुटता रहती थी। अब तो छात्र राजनीति की स्थिति बेहद खराब है और इसलिए दावेदारों की बात सुनने के प्रति विद्यार्थियों में क्रेज नहीं है। - सुनील चौहान (छात्र संघ अध्यक्ष 1997-98)।
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रुद्रपुर। राजनीति की पहली सीढ़ी माने जाने वाली छात्र राजनीति को लेकर विद्यार्थियों का उत्साह फीका पड़ने लगा है। शनिवार को एसबीएस डिग्री कॉलेज में शनिवार को होने वाली आम सभा में प्रत्याशियों और विद्यार्थियों का नहीं पहुंचना इसका ताजा उदाहरण है।
लिंगदोह समिति की सिफारिशों के चलते एक दशक तक बंद रही आम सभा फिर से शुरू तो की गई लेकिन लगातार दूसरे साल भी आम सभा में प्रत्याशी और विद्यार्थियों के नहीं पहुंचने से इसे रद्द करना पड़ा। किसी दौर में आम सभा के दिन विद्यार्थियों के भरा रहने वाले कॉलेज में सन्नाटा ही पसरा रहा। यह हालात छात्र राजनीति की कुंद होती धार को भी बयां करते हैं।
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दरअसल छात्रसंघ चुनाव में आम सभा का बड़ा महत्व होता था। आम सभा में अपनी बात को प्रखरता से रखकर विद्यार्थियों को रिझाने वाला ही अध्यक्ष और अन्य पदों में चुना जाता था। आम सभा में कई बार प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच हुए विवादों के चलते इसे बंद करना पड़ा लेकिन छात्रों की मांग के चलते आम सभा शुरू और बंद भी की गई थी।
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आमसभा में प्रखरता से बात रखकर पदाधिकारी चुने गए कई नेता वर्तमान में सियासत के बड़े चेहरे हैं। चार बार अध्यक्ष रहे राजकुमार ठुकराल रुद्रपुर से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। इसी कॉलेज की छात्र राजनीति में पैर जमाकर अध्यक्ष बने राजेश शुक्ला भी दूसरी बार किच्छा के विधायक हैं। इसके अलावा तमाम ऐसे चेहरे हैं, जो छात्र राजनीति से उभरकर अपने क्षेत्र में पहचान बनाए हुए हैं। लेकिन बदलते दौर में अब आमसभा में बात रखने तक में प्रत्याशी कतराते हैं।
स्थिति यह हो गई है कि पिछले चुनाव में तो सभी दावेदारों ने एकमत होकर आम सभा नहीं कराने का अनुरोध किया था। यह कहा जा सकता है कि अब छात्रसंघ चुनाव सिर्फ हो हुल्लड़ और औपचारिकता तक ही सीमित है। दावेदारों के पास विजन ही नहीं है। छात्र नेता जब छात्रों के सामने ही बोलने से कतराएंगे तो सरकार और वीसी के सामने कैसे अपनी बात रख पाएंगे।
वर्ष 1995 में हुए छात्र संघ चुनाव में मेरे प्रयासों से आमसभा हुई थी लेकिन विपक्षियों ने माइक तोड़ दिया था। तब मैंने बिना माइक के विद्यार्थियों को संबोधित किया था और अध्यक्ष चुना गया था। आमसभा में प्रत्याशी के भाषण से विद्यार्थी उसके विजन और क्षमता परखते थे। सभा में विद्यार्थियों की भी काफी भीड़ रहती थी। अब तो चुनाव धनबल में सिमट गया है। - राजेश शुक्ला, विधायक किच्छा (अध्यक्ष 1995-96)।
अब छात्र संघ चुनाव औपचारिकता भर रह गया है। हमारे समय में पहले आमसभा का विद्यार्थियों को इंतजार रहता था। मैं तीन बार चुनकर और एक बार मनोनीत अध्यक्ष रहा था। तब प्रत्याशी का भाषण ही वोटरों को प्रभावित करता था। अब राजनीति सिर्फ चुनाव तक की सिमट गई है। विद्यार्थी भी आम सभा में आना पसंद नहीं करते हैं। - राजकुमार ठुकराल, विधायक रुद्रपुर (अध्यक्ष 1989 से 1993)।
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पहले चुनाव में दावेदारों के बीच भाषण की प्रतिस्पर्धा होती थी। अपने भाषण में प्रभावी मुद्दे रखने वाला अध्यक्ष चुना जाता था। सालभर विद्यार्थियों को आम सभा का इंतजार रहता था और आमसभा में काफी भीड़ हुआ करती थी। कॉलेज प्रशासन के बजाय दावेदारों के अपने-अपने भाषण के मंच होते थे। अब तो चुनाव मुद्दा विहीन हो चुके हैं। - कमलेंद्र सेमवाल, (छात्र संघ अध्यक्ष 1993-94)।
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आम सभा के प्रति पहले खासा क्रेज होता था। विद्यार्थियों के अलावा बाहर के लोग भी प्रत्याशी का भाषण सुनने पहुंचते थे। मुद्दों पर भाषण होते थे और छात्र हितों की आवाज उठाने के लिए एकजुटता रहती थी। अब तो छात्र राजनीति की स्थिति बेहद खराब है और इसलिए दावेदारों की बात सुनने के प्रति विद्यार्थियों में क्रेज नहीं है। - सुनील चौहान (छात्र संघ अध्यक्ष 1997-98)।

राजकुमार ठुकराल, विधायक रुद्रपुर- फोटो : RUDRAPUR

सुनील चौहान, पार्षद, रुद्रपुर- फोटो : RUDRAPUR

राजेश शुक्ला, किच्छा विधायक- फोटो : RUDRAPUR