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नसीहत देने वालों के परिसर में धड़ल्ले से जल रही पराली
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पंतनगर। पराली जलाने से मृदा की उर्वरता कम होने समेत पर्यावरण को हो रहे भारी नुकसान से किसानों को आगाह करने वाले वैज्ञानिक खुद पराली जलवा रहे हैं। इसकी बानगी रविवार को पंतनगर विवि परिसर के टी-ब्लॉक में विवि के अधीन 30 एकड़ प्रक्षेत्र में खड़ी सोयाबीन की पराली जलाने के दौरान देखी गई। पराली जलाने की सूचना पर प्रशासन में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में पहुंचे मुख्य महाप्रबंधक फार्म डॉ. डीके सिंह ने वहां मौजूद कर्मचारियों को फटकार लगाते हुए, ट्रैक्टर से जुताई करवाकर आग बुझाई।
पराली जलाने के विकल्प के तौर पर ’प्लाऊ’ व ’सुपरसीडर’ जैसी तकनीकों की उपलब्धता का दावा करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पराली जलाने से वातावरण में प्रदूषण तो बढ़ता ही है, मृदा की ऊपरी सतह जलने से जीवाश्म, जिंक, कार्बन के साथ ही कई सूक्ष्म तत्व भी जल जाते हैं। हरित क्रांति की जन्मस्थली पंतनगर में लीज होल्डरों की ओर से पराली जलाने संबंधी सूचना पर शनिवार को सीजीएम से वार्ता की गई, तो उन्होंने इसे नकार दिया।
कहा कि हमारे यहां सुपरसीडर व प्लाऊ जैसी तकनीकें हैं, जिनसे फसल काटने के बाद खेत में खड़ी पराली को जुताई कर मिट्टी में ही दबा दिया जाता है, जो उसमें सड़कर उर्वरक का काम करती है। इस यंत्र से कटाई, जुताई एवं बुवाई जैसे कई कार्य एक साथ हो जाते हैं। साथ ही लीज होल्डरों द्वारा खेत में फसल अवशेष जलाने पर अनुबंध तक रद्द करने का प्रावधान किया गया है।
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बता दें कि पंतनगर विवि के पास करीब साढ़े चार हजार एकड़ कृषि योग्य भूमि है, जिसमें से करीब 2700 एकड़ कृषि भूमि किसानों को लीज पर दी जाती है। शेष 1800 एकड़ कृषि भूमि पर विवि प्रशासन स्वयं सीड प्रोडक्शन व शोध कार्य आदि करता है।
रविवार को प्रशासनिक भवन से सिर्फ आधा किमी. दूर टी-ब्लाक के 30 एकड़ भूमि पर सीड प्रोडक्शन के लिए बोई गई सोयाबीन की फसल कटने के बाद उसकी पराली जलाई जा रही थी। सीजीएम ने इसका ठीकरा श्रमिक पर फोड़ते हुए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की बात भी कही, जबकि सोचने वाली बात है कि पराली जलाने का इतना बड़ा निर्णय श्रमिक कैसे ले सकता है।
केंद्र की है रोक, पूर्व में निलंबित हो चुके हैं विवि के एक अधिकारी
पंतनगर। विवि में वर्ष 2016 में तत्कालीन कुलपति डॉ. मंगला राय पराली जलवाने पर विवि फार्म के सहायक निदेशक डॉ. एके तोमर को निलंबित कर चुके हैं। बता दें कि किसानों की ओर से खेत में पराली जलाने से पर्यावरण सहित मृदा को हो रहे नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए प्रदेशों के प्रमुख सचिव को फटकार लगाई थी, जिस पर केंद्र सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगा दी। साथ ही पंजाब सरकार ने इस पर रोक के लिए किसानों से सौ रुपये प्रति क्विंटल पराली खरीदना शुरू कर दिया है। इधर, आईसीएआर व सीएसआइआर जैसे संस्थानों ने कृषि विश्वविद्यालयों को पत्र भेजकर किसानों को जागरूक करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य महाप्रबंधक फार्म डॉ. डीके सिंह ने कहा कि पराली जलवाना एक लेबर की मनमानी थी। सूचना मिलते ही ट्रैक्टर से जुतवाकर आग बुझवा दी गई है। मैं एक कृषि वैज्ञानिक हूं, पराली जलाने के नफा-नुकसान जानता हूं। आगे से ऐसा नहीं हो, यह सुनिश्चित किया जाएगा।
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पराली जलाने के विकल्प के तौर पर ’प्लाऊ’ व ’सुपरसीडर’ जैसी तकनीकों की उपलब्धता का दावा करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पराली जलाने से वातावरण में प्रदूषण तो बढ़ता ही है, मृदा की ऊपरी सतह जलने से जीवाश्म, जिंक, कार्बन के साथ ही कई सूक्ष्म तत्व भी जल जाते हैं। हरित क्रांति की जन्मस्थली पंतनगर में लीज होल्डरों की ओर से पराली जलाने संबंधी सूचना पर शनिवार को सीजीएम से वार्ता की गई, तो उन्होंने इसे नकार दिया।
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कहा कि हमारे यहां सुपरसीडर व प्लाऊ जैसी तकनीकें हैं, जिनसे फसल काटने के बाद खेत में खड़ी पराली को जुताई कर मिट्टी में ही दबा दिया जाता है, जो उसमें सड़कर उर्वरक का काम करती है। इस यंत्र से कटाई, जुताई एवं बुवाई जैसे कई कार्य एक साथ हो जाते हैं। साथ ही लीज होल्डरों द्वारा खेत में फसल अवशेष जलाने पर अनुबंध तक रद्द करने का प्रावधान किया गया है।
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बता दें कि पंतनगर विवि के पास करीब साढ़े चार हजार एकड़ कृषि योग्य भूमि है, जिसमें से करीब 2700 एकड़ कृषि भूमि किसानों को लीज पर दी जाती है। शेष 1800 एकड़ कृषि भूमि पर विवि प्रशासन स्वयं सीड प्रोडक्शन व शोध कार्य आदि करता है।
रविवार को प्रशासनिक भवन से सिर्फ आधा किमी. दूर टी-ब्लाक के 30 एकड़ भूमि पर सीड प्रोडक्शन के लिए बोई गई सोयाबीन की फसल कटने के बाद उसकी पराली जलाई जा रही थी। सीजीएम ने इसका ठीकरा श्रमिक पर फोड़ते हुए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की बात भी कही, जबकि सोचने वाली बात है कि पराली जलाने का इतना बड़ा निर्णय श्रमिक कैसे ले सकता है।
केंद्र की है रोक, पूर्व में निलंबित हो चुके हैं विवि के एक अधिकारी
पंतनगर। विवि में वर्ष 2016 में तत्कालीन कुलपति डॉ. मंगला राय पराली जलवाने पर विवि फार्म के सहायक निदेशक डॉ. एके तोमर को निलंबित कर चुके हैं। बता दें कि किसानों की ओर से खेत में पराली जलाने से पर्यावरण सहित मृदा को हो रहे नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए प्रदेशों के प्रमुख सचिव को फटकार लगाई थी, जिस पर केंद्र सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगा दी। साथ ही पंजाब सरकार ने इस पर रोक के लिए किसानों से सौ रुपये प्रति क्विंटल पराली खरीदना शुरू कर दिया है। इधर, आईसीएआर व सीएसआइआर जैसे संस्थानों ने कृषि विश्वविद्यालयों को पत्र भेजकर किसानों को जागरूक करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य महाप्रबंधक फार्म डॉ. डीके सिंह ने कहा कि पराली जलवाना एक लेबर की मनमानी थी। सूचना मिलते ही ट्रैक्टर से जुतवाकर आग बुझवा दी गई है। मैं एक कृषि वैज्ञानिक हूं, पराली जलाने के नफा-नुकसान जानता हूं। आगे से ऐसा नहीं हो, यह सुनिश्चित किया जाएगा।