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पावौ गांव में पहाड़ जैसी समस्याएं
अमर उजाला ब्यूरो रुद्रप्रयाग
Updated Sat, 13 Feb 2016 09:54 PM IST
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पावौ गांव के लिए जिला मुख्यालय से 9 किमी की खड़ी चढ़ाई है। 100 परिवारों वाले इस गांव की आबादी करीब सवा छह सौ है। अधिकांश ग्रामीणों की आजीविका खेतीबाड़ी और पशुपालन पर निर्भर है। यह गांव सड़क सुविधा से वंचित है। एक दशक पहले यहां रैंतोली-जसोली-पावौ सड़क स्वीकृत हुई थी, लेकिन पावौ तक सड़क नहीं पहुंच पाई। गांव में बिजली की लाइनें तो हैं, लेकिन हल्की हवा में भी तारें आपस में टकरा जाती हैं। इससे बिजली की सप्लाई ठप रहती है।
बुखार की दवा, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं का टीकाकरण के लिए भी ग्रामीणों को रुद्रप्रयाग की दौड़ लगानी पड़ रही है। उनका कहना है कि दुर्गम होने से बीमार व घायल को रुद्रप्रयाग पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। वनाग्नि से झुलसी किशोरियों को भी इसी समस्या के कारण घटना के छह घंटे बाद प्राथमिक उपचार मिल पाया था।
ग्राम प्रधान बीरा देवी सहित शेर सिंह व राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तराखंड बनने के बाद भी मंत्री या विधायक ने गांव की सुध नहीं ली है। सुविधाओं के अभाव में एक दशक में गांव से 12 परिवार, दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, रुद्रप्रयाग व श्रीनगर पलायन कर चुके हैं।
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सरकारी नौकरी में गिनती के लोग
100 परिवारों वाले पावौ गांव में सरकारी नौकरी में बमुश्किल 12-14 लोग ही हैं। ये भी वे परिवार हैं, जिनकी स्थिति पहले से ठीक थी। जबकि 7-8 लोगों की रुद्रप्रयाग में पान, चाय व कपड़े की दुकानें हैं। 15-20 युवा दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, श्रीनगर व रुद्रप्रयाग में प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं।
पढ़ाई के लिए रिश्तेदारों का सहारा
पावौ गांव के बच्चों को 8वीं के बाद 7 किमी दूर जीआईसी पीड़ा व 6 किमी दूर जीआईसी ग्वेफड़ की दौड़ लगानी पड़ रही है। कई बच्चे बच्छणस्यूं पट्टी के जीआईसी मुल्खाखाल व बरसूड़ी से भी हाईस्कूल व इंटर की पढ़ाई कर रहे हैं, जो अपने रिश्तेदारों के साथ रह रहे हैं।
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बुखार की दवा, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं का टीकाकरण के लिए भी ग्रामीणों को रुद्रप्रयाग की दौड़ लगानी पड़ रही है। उनका कहना है कि दुर्गम होने से बीमार व घायल को रुद्रप्रयाग पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। वनाग्नि से झुलसी किशोरियों को भी इसी समस्या के कारण घटना के छह घंटे बाद प्राथमिक उपचार मिल पाया था।
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ग्राम प्रधान बीरा देवी सहित शेर सिंह व राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तराखंड बनने के बाद भी मंत्री या विधायक ने गांव की सुध नहीं ली है। सुविधाओं के अभाव में एक दशक में गांव से 12 परिवार, दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, रुद्रप्रयाग व श्रीनगर पलायन कर चुके हैं।
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सरकारी नौकरी में गिनती के लोग
100 परिवारों वाले पावौ गांव में सरकारी नौकरी में बमुश्किल 12-14 लोग ही हैं। ये भी वे परिवार हैं, जिनकी स्थिति पहले से ठीक थी। जबकि 7-8 लोगों की रुद्रप्रयाग में पान, चाय व कपड़े की दुकानें हैं। 15-20 युवा दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, श्रीनगर व रुद्रप्रयाग में प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं।
पढ़ाई के लिए रिश्तेदारों का सहारा
पावौ गांव के बच्चों को 8वीं के बाद 7 किमी दूर जीआईसी पीड़ा व 6 किमी दूर जीआईसी ग्वेफड़ की दौड़ लगानी पड़ रही है। कई बच्चे बच्छणस्यूं पट्टी के जीआईसी मुल्खाखाल व बरसूड़ी से भी हाईस्कूल व इंटर की पढ़ाई कर रहे हैं, जो अपने रिश्तेदारों के साथ रह रहे हैं।