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होली के हुडदंग से दूर क्वीली, कुरझण और जौंदला गांव
Updated Thu, 01 Mar 2018 10:36 PM IST
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रुद्रप्रयाग। अबीर गुलाल के साथ होली के होल्यार, गांव से बाजारों में पहुंचने लगे हैं। जिले के नगरीय क्षेत्रों में भी बैठकी होली चरम पर है। लेकिन अगस्त्यमुनि विकासखंड के तल्लानागपुर पट्टी के क्वीली, कुरझण और जौंदला गांव, इस उत्साह व हलचल से कोसों दूर हैं। यहां न तो कोई होल्यार आता है और न ग्रामीण एक-दूसरे पर रंग लगाते हैं। लगभग बीते डेढ़ सौ वर्ष से इन गांवों में होली नहीं मनाई गई है।
जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर बसे इन तीन गांवों की बसागत 17वीं सदी के मध्य की मानी जाती है। जम्मू-कश्मीर से कुछ पुरोहित परिवार अपने यजमान व काश्तकारों के साथ लगभग 271 वर्ष पूर्व यहां आकर बस गए थे। ये लोग, तब अपनी ईष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी (सुमुखी) की मूर्ति व पूजन सामग्री भी साथ लेकर आए थे, जिसे गांव में स्थापित किया गया। अराध्य को वैष्णो देवी की बहन माना जाता है। यहां के लोग मां नंदा और क्षेत्रपाल भेल देवता को भी अपना अराध्य मानते, जिसकी समय-समय पर विशेष पूजा होती है। कहना है कि उनकी कुलदेवी और भूम्याल भेल देवता को होली का हुड़दंग पसंद नहीं है, इसलिए वे सदियों से होली का त्यौहार नहीं मनाते हैं। कुरझण गांव निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंद्रशेखर पुरोहित प्राचीन मान्यताओं का हवाला देते हुए बताते हैं कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व गांव में होली खेली तो, तीन गांवों में हैजा फैल गया था, जिसमें कई लोग व्यापक रूप से आहत हो गए थे। तब, से आज तक गांव में होली नहीं खेली गई है। इधर, एचएनबी केंद्रीय विवि श्रीनगर गढ़वाल के लोक संस्कृति व निस्पादन केंद्र के पूर्व निदेशक व क्वीली निवासी डा. डीआर पुरोहित बताते हैं कि गांव में उनकी 16 पीढ़ी हो गई हैं। जब से होश संभाला है, होली नहीं खेलने की बात सुनी हैं। पुरोहित पूर्वजों का हवाला देते हुए बताते हैं कि उनकी कुलदेवी को होली के रंग अच्छे नहीं लगते हैं। ग्राम पंचायत क्वीली के प्रधान भगवती भिलंगवाल, कुरझण की प्रधान वंदना देवी और जौंदला के प्रधान अनीता देवी सहित रितेष पांडे व अनूप नेगी का कहना है कि उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि एक बार कुछ लोगों ने होली पर एक-दूसरे पर रंग लगाया था, तो गांव में कई लोग बीमार हो गए थे। इसके बाद से इन गांवों में होली का त्यौहार नहीं मनाया जाता।
जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर बसे इन तीन गांवों की बसागत 17वीं सदी के मध्य की मानी जाती है। जम्मू-कश्मीर से कुछ पुरोहित परिवार अपने यजमान व काश्तकारों के साथ लगभग 271 वर्ष पूर्व यहां आकर बस गए थे। ये लोग, तब अपनी ईष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी (सुमुखी) की मूर्ति व पूजन सामग्री भी साथ लेकर आए थे, जिसे गांव में स्थापित किया गया। अराध्य को वैष्णो देवी की बहन माना जाता है। यहां के लोग मां नंदा और क्षेत्रपाल भेल देवता को भी अपना अराध्य मानते, जिसकी समय-समय पर विशेष पूजा होती है। कहना है कि उनकी कुलदेवी और भूम्याल भेल देवता को होली का हुड़दंग पसंद नहीं है, इसलिए वे सदियों से होली का त्यौहार नहीं मनाते हैं। कुरझण गांव निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंद्रशेखर पुरोहित प्राचीन मान्यताओं का हवाला देते हुए बताते हैं कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व गांव में होली खेली तो, तीन गांवों में हैजा फैल गया था, जिसमें कई लोग व्यापक रूप से आहत हो गए थे। तब, से आज तक गांव में होली नहीं खेली गई है। इधर, एचएनबी केंद्रीय विवि श्रीनगर गढ़वाल के लोक संस्कृति व निस्पादन केंद्र के पूर्व निदेशक व क्वीली निवासी डा. डीआर पुरोहित बताते हैं कि गांव में उनकी 16 पीढ़ी हो गई हैं। जब से होश संभाला है, होली नहीं खेलने की बात सुनी हैं। पुरोहित पूर्वजों का हवाला देते हुए बताते हैं कि उनकी कुलदेवी को होली के रंग अच्छे नहीं लगते हैं। ग्राम पंचायत क्वीली के प्रधान भगवती भिलंगवाल, कुरझण की प्रधान वंदना देवी और जौंदला के प्रधान अनीता देवी सहित रितेष पांडे व अनूप नेगी का कहना है कि उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि एक बार कुछ लोगों ने होली पर एक-दूसरे पर रंग लगाया था, तो गांव में कई लोग बीमार हो गए थे। इसके बाद से इन गांवों में होली का त्यौहार नहीं मनाया जाता।
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