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खंड-खंड होती एकजुटता को किसान आंदोलन ने एक सूत्र में बांधा
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रुड़की स्थित प्रशासनिक भवन में कृषि बिल वापस होने पर खुशी मनाते उत्तराखंड किसान मोर्चा के पदाधि?
- फोटो : ROORKEE
किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने 40 साल पहले यूपी के शामली में किसानों के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ी थी। उनके जीवित रहते किसानों का कद भारतीय राजनीति के अक्स पर था, लेकिन उनके जाने के बाद भारतीय किसान यूनियन के इतने फाड़ हुए कि सत्ता के गलियारों में किसानों की आवाज भी खंड-खंड होने लगी। इसके बाद राकेश टिकैत ने दिल्ली में लाल किले पर कूच के दौरान फिर से डगमगाए रथ की न केवल कमान संभाली बल्कि उनके नेतृत्व में अलग-अलग धड़ों में बंटे विभिन्न किसान संगठनों ने एकसाथ मंच साझा करने लगे। शायद यही कारण है कि केंद्र सरकार को किसानों के सामने नतमस्तक होना पड़ा।
चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की राजनीतिक में अपनी बोली-भाषा, रहन सहन और गुस्सैल मिजाजी से मसीहा के रूप स्थापित हुए। यह बात अस्सी के दशक की है, जब यूपी के शामली में बिजलीघर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत ने आंदोलन कर पुलिस-प्रशासन से आरपार की लड़ाई लड़ी। उनका प्रभाव बढ़ता गया और वे मसीहा के रूप में जाने जाने लगे, लेकिन उनके निधन के बाद भारतीय किसान यूनियन धड़ों में बंटने लगी। इसके बाद कई नए संगठनों का जन्म हुआ। सबसे पहले भाकियू से ऋषिपाल अंबावता ने भाकियू अंबावता गुट बनाया। इस संगठन की रुड़की क्षेत्र में किसान नेता पद्म सिंह भाटी ने अगुवाई की।
राज्य गठन के बाद भाकियू के ब्लॉक अध्यक्ष रहे चौधरी सतीश रोड़ ने अलग संगठन उत्तराखंड किसान मोर्चा बना लिया। वर्तमान में उनके बेटे गुलशन रोड़ इस संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। भाकियू के कद्दावर नेता पद्म सिंह रोड़ ने भी भाकियू रोड़ गुट बना लिया। वह अब संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। इसके अलावा विकेश बालियान ने भाकियू तोमर गुट का दामन पकड़ लिया जबकि राकेश अग्रवाल उत्तराखंड किसान मोर्चा से भी अलग हो गए और अपना एक अलग संगठन बना लिया। करीब 20 वर्षों से अलग-अलग धड़ों में बंटे सभी संगठन किसानों के मुद्दे पर अलग-अलग मुहिम चलाते रहे, लेकिन जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन शुरू हुआ तो एक साथ मिलकर सभी संगठनों के किसान दिल्ली पहुंचे। यही नहीं, मंगलौर गुड़ मंडी और लक्सर में हुई टिकैत की महापंचायतों में सभी संगठन एकजुट हो गए।
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ऐतिहासिक महापंचायतों ने दी आंदोलन को धार
टिकैत भाइयों की दो महापंचायतों ने फूंकी हरिद्वार के किसानों में जान
संवाद न्यूज एजेंसी
रुड़की। एक साल के किसान आंदोलन में कई ऐतिहासिक परिवर्तन आए। किसान आंदोलन ने जिले में उस समय धार पकड़ी, जब भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत ने मंगलौर गुड़ मंडी में उस समय महापंचायत की, जब उनके भाई राकेश टिकैत दिल्ली में हजारों पुलिसकर्मियों के घेरे में केंद्र सरकार से लोहा ले रहे थे। उस समय में किसानों के मन में अपने नेता के प्रति जबरदस्त सहानुभूति थी।
जिस समय दिल्ली में आंदोलन चरम पर था, उस समय चौधरी राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत घूम-घूमकर विभिन्न जिलों और प्रदेशों में किसानों की महापंचायत कर रहे थे। वह मंगलौर स्थित गुड़ मंडी में किसानों की महापंचायत में पहुंचे तो समूचा प्रशासन और खुफिया विभाग अलर्ट दिखा। इस महापंचायत में उत्तराखंड समेत पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान भी पहुंचे। विभिन्न किसान संगठन भी एक मंच पर दिखे। तीन फरवरी को आयोजित इस महापंचायत के बाद से किसान आंदोलन जिले में रफ्तार पकड़ने लगा था। इसके बाद 22 सितंबर को खुद चौधरी राकेश टिकैत लक्सर में किसान महापंचायत को संबोधित करने पहुंचे। भारी भीड़ के बीच चौधरी टिकैत ने अपनी शैली में किसानों के सामने बात रखी तो एक सिरे से हर किसान ने उनका समर्थन किया। इसके बाद माना जाने लगा था कि हरिद्वार जिले का किसान अब पीछे हटने वाला नहीं है। इसका असर यह रहा कि जगह-जगह किसानों ने विभिन्न मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके चलते राजनीतिक फिजा में बदलाव देखने को मिलने लगा। टिकैत भाइयों की महापंचायतों ने किसानों को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई। यही नहीं, किसान बहुल इलाके को मद्देनजर रखते हुए लखीमपुर खीरी के किसानों की अस्थि कलश यात्रा का भी नारसन बॉर्डर से शुभारंभ किया गया।
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चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की राजनीतिक में अपनी बोली-भाषा, रहन सहन और गुस्सैल मिजाजी से मसीहा के रूप स्थापित हुए। यह बात अस्सी के दशक की है, जब यूपी के शामली में बिजलीघर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत ने आंदोलन कर पुलिस-प्रशासन से आरपार की लड़ाई लड़ी। उनका प्रभाव बढ़ता गया और वे मसीहा के रूप में जाने जाने लगे, लेकिन उनके निधन के बाद भारतीय किसान यूनियन धड़ों में बंटने लगी। इसके बाद कई नए संगठनों का जन्म हुआ। सबसे पहले भाकियू से ऋषिपाल अंबावता ने भाकियू अंबावता गुट बनाया। इस संगठन की रुड़की क्षेत्र में किसान नेता पद्म सिंह भाटी ने अगुवाई की।
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राज्य गठन के बाद भाकियू के ब्लॉक अध्यक्ष रहे चौधरी सतीश रोड़ ने अलग संगठन उत्तराखंड किसान मोर्चा बना लिया। वर्तमान में उनके बेटे गुलशन रोड़ इस संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। भाकियू के कद्दावर नेता पद्म सिंह रोड़ ने भी भाकियू रोड़ गुट बना लिया। वह अब संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। इसके अलावा विकेश बालियान ने भाकियू तोमर गुट का दामन पकड़ लिया जबकि राकेश अग्रवाल उत्तराखंड किसान मोर्चा से भी अलग हो गए और अपना एक अलग संगठन बना लिया। करीब 20 वर्षों से अलग-अलग धड़ों में बंटे सभी संगठन किसानों के मुद्दे पर अलग-अलग मुहिम चलाते रहे, लेकिन जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन शुरू हुआ तो एक साथ मिलकर सभी संगठनों के किसान दिल्ली पहुंचे। यही नहीं, मंगलौर गुड़ मंडी और लक्सर में हुई टिकैत की महापंचायतों में सभी संगठन एकजुट हो गए।
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ऐतिहासिक महापंचायतों ने दी आंदोलन को धार
टिकैत भाइयों की दो महापंचायतों ने फूंकी हरिद्वार के किसानों में जान
संवाद न्यूज एजेंसी
रुड़की। एक साल के किसान आंदोलन में कई ऐतिहासिक परिवर्तन आए। किसान आंदोलन ने जिले में उस समय धार पकड़ी, जब भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत ने मंगलौर गुड़ मंडी में उस समय महापंचायत की, जब उनके भाई राकेश टिकैत दिल्ली में हजारों पुलिसकर्मियों के घेरे में केंद्र सरकार से लोहा ले रहे थे। उस समय में किसानों के मन में अपने नेता के प्रति जबरदस्त सहानुभूति थी।
जिस समय दिल्ली में आंदोलन चरम पर था, उस समय चौधरी राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत घूम-घूमकर विभिन्न जिलों और प्रदेशों में किसानों की महापंचायत कर रहे थे। वह मंगलौर स्थित गुड़ मंडी में किसानों की महापंचायत में पहुंचे तो समूचा प्रशासन और खुफिया विभाग अलर्ट दिखा। इस महापंचायत में उत्तराखंड समेत पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान भी पहुंचे। विभिन्न किसान संगठन भी एक मंच पर दिखे। तीन फरवरी को आयोजित इस महापंचायत के बाद से किसान आंदोलन जिले में रफ्तार पकड़ने लगा था। इसके बाद 22 सितंबर को खुद चौधरी राकेश टिकैत लक्सर में किसान महापंचायत को संबोधित करने पहुंचे। भारी भीड़ के बीच चौधरी टिकैत ने अपनी शैली में किसानों के सामने बात रखी तो एक सिरे से हर किसान ने उनका समर्थन किया। इसके बाद माना जाने लगा था कि हरिद्वार जिले का किसान अब पीछे हटने वाला नहीं है। इसका असर यह रहा कि जगह-जगह किसानों ने विभिन्न मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके चलते राजनीतिक फिजा में बदलाव देखने को मिलने लगा। टिकैत भाइयों की महापंचायतों ने किसानों को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई। यही नहीं, किसान बहुल इलाके को मद्देनजर रखते हुए लखीमपुर खीरी के किसानों की अस्थि कलश यात्रा का भी नारसन बॉर्डर से शुभारंभ किया गया।