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‘बोले प्राण, 65 बार मंडप में बैठा पर शादी नहीं हुई’
देहरादून/प्रवेश कुमारी
Updated Sun, 14 Jul 2013 11:27 AM IST
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लगभग 42 साल पहले की बात है। मैं उस वक्त लगभग नौ साल का था। परिवार मेरठ में रहता था, लेकिन मैं यहां अपनी मौसी के यहां आया हुआ था, जो रेसकोर्स में रहती थीं।
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एक शाम एक पारिवारिक मित्र हड़बड़ी में घर पहुंचे और उनसे बोले-भाभी रिजेंट होटल में प्राण ठहरे हैं। मिलना चाहती हैं तो शाम को चलें। प्राण का नाम सुनते ही पूरा परिवार उनसे मिलने के लिए तैयार हो गया। मेरी तो उत्सुकता का कोई ओर-छोर नहीं था।
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सेल्युलाइड पर डराने वाले उस इंसान को देखने के लिए बेहद उत्तेजना थी। खैर, शाम के वक्त होटल जा पहुंचे। गंगा तेरा पानी अमृत फिल्म की यूनिट के सदस्य यहां ठहरे हुए थे। प्राण कुर्ते-पाजामे में सोफे पर बैठै थे। उनसे परिचय हुआ तो उन्होंने हाथ मिलाया।
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इसी बीच किसी ने उनके विलेन से ‘अच्छे इंसान’ वाले चरित्र में बदलते जाने की बाबत पूछा तो वह मुस्कराकर बोले-यारा, फिल्मों में 65 बार मंडप में बैठा, लेकिन शादी नहीं हो पाई।
पहले ही हीरो आ टपकता था। अब तो मंडप तक पहुंचने की भी उम्र नहीं रही। यह सुन सब ठहाका लगाकर हंस पड़े। यही वक्त था, जब प्राण ने केवल ‘अच्छे’ रोल ही करने की बात कही।
(मनोज पंजवानी इस वक्त दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, परेड ग्राउंड में हैं। फिल्मों पर आधारित कई डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं। छह साल तक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में गांधीवादी विचारधारा की शिक्षा दी। हाल ही में सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर उन्होंने सेंटर में सिनेमा की यात्रा पर एक प्रदर्शनी भी लगाई थी)