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अति दोहन से दम तोड़ रहे हैं यारसागंबू के लारवा
ब्यूरो/अमर उजाला,दीपक उप्रेती /पिथौरागढ़
Updated Mon, 08 Feb 2016 10:08 PM IST
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शक्तिवर्द्धक यारसागंबू (कीड़ा-जड़ी) की खोज में हर साल जाने वाले सैकड़ों लोगों की आवाजाही बढ़ने से वहां की जमीन कठोर हो रही है। अति दोहन से यारसागंबू के लारवा को नुकसान पहुंच रहा है। कभी बहुतायत में मिलने वाली कीड़ा-जड़ी अब कम मिलने के पीछे मुख्य कारण है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में मिट्टी की कोमलता कम होती जा रही है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि हिमालयी जड़ी यारसागंबू के पैदा होने के लिए कम तापमान और कोमल मिट्टी का योगदान रहता है, न कि बर्फबारी का।
यारसागंबू के संकट के आने के बाद इस पर गहन शोध शुरू हो गए हैं। रक्षा कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला ने इस पर अध्ययन शुरू किया है, जबकि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़ के जंतु विज्ञान विभाग के प्रवक्ता डा. सीएस नेगी ने राष्ट्रीय पादप बोर्ड स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से इस पर एक शोधपत्र तैयार किया है। अभी भी वह इसके गहन अध्ययन में जुटे हुए हैं। उन्होंने माउंटेन रिसर्च एंड डेवलपमेंट जर्नल में भी यारसागंबू पर ताजा लेख प्रकाशित किया है। डा. नेगी का मानना है कि हिमालय की चोटियों में कम या ज्यादा बर्फ गिरने से यारसागंबू की उपलब्धता पर असर नहीं पड़ता। उच्च हिमालयी क्षेत्र में हर समय तापमान न्यूनतम स्तर पर रहता है।
यारसागंबू अलग-अलग व्यंजन में अलग-अलग असर करता है। रासायनिक परीक्षण में उन्होंने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि यारसा गंबू में बिटामिन बी-12, मेनोटाल, कार्डिसेपिक अम्ल, इर्गोस्टाल तथा 25 से 32 प्रतिशत कार्डोसेपिन और डीपाक्सीनोपिन पाया जाता है। यारसा गंबू संग्रह का काम अप्रैल से शुरू हो जाता है। मई और जून में यह काम चरम पर पहुंच जाता है।
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-प्रवक्ता डा. सीएस नेगी, जंतु विज्ञान विभाग पिथौरागढ़।
जंतु विज्ञानियों ने यारसा गंबू का वानस्पतिक नाम कारडिसेप्स साइनेंनसिक दिया है। यारसा गंबू को इंटोमोफिलस समूह के अंतर्गत हाइपोसेडेल्ज परिवार का सदस्य बताया गया है। यह काले रंग का तंतुकार कवक है, जो 3200 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। यह कवक लारवा पर परजीवी के रूप में संक्रमण करता है। यारसा गंबू करीब साढ़े तीन लाख रुपये किलो मिलती है।
कैसे बनता है यारसा गंबू
अध्ययन के अनुसार बसंत ऋतु की समाप्ति के समय कवक का तंतुजाल लारवा को संक्रमित करता है तथा ग्रीष्म ऋतु शुरू होते ही कवक लारवा को मृत करने के बाद फु्रटिंग बाडी के रूप में शीर्ष भाग से बाहर निकलता है। ऐसा लगता है जैसे कोई घास उगी है। इसी कारण स्थानीय लोग यारसा गंबू को कीड़ा जड़ी कहते हैं। इसकी लंबाई सात से दस सेंटीमीटर तक होती है। चीन के लोगों को तब आश्चर्य हुआ जब जानवरों को यह कवक खिलाने से उनकी क्षमता असाधारण रूप से बढ़ गई।
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यारसागंबू के संकट के आने के बाद इस पर गहन शोध शुरू हो गए हैं। रक्षा कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला ने इस पर अध्ययन शुरू किया है, जबकि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़ के जंतु विज्ञान विभाग के प्रवक्ता डा. सीएस नेगी ने राष्ट्रीय पादप बोर्ड स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से इस पर एक शोधपत्र तैयार किया है। अभी भी वह इसके गहन अध्ययन में जुटे हुए हैं। उन्होंने माउंटेन रिसर्च एंड डेवलपमेंट जर्नल में भी यारसागंबू पर ताजा लेख प्रकाशित किया है। डा. नेगी का मानना है कि हिमालय की चोटियों में कम या ज्यादा बर्फ गिरने से यारसागंबू की उपलब्धता पर असर नहीं पड़ता। उच्च हिमालयी क्षेत्र में हर समय तापमान न्यूनतम स्तर पर रहता है।
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यारसागंबू अलग-अलग व्यंजन में अलग-अलग असर करता है। रासायनिक परीक्षण में उन्होंने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि यारसा गंबू में बिटामिन बी-12, मेनोटाल, कार्डिसेपिक अम्ल, इर्गोस्टाल तथा 25 से 32 प्रतिशत कार्डोसेपिन और डीपाक्सीनोपिन पाया जाता है। यारसा गंबू संग्रह का काम अप्रैल से शुरू हो जाता है। मई और जून में यह काम चरम पर पहुंच जाता है।
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-प्रवक्ता डा. सीएस नेगी, जंतु विज्ञान विभाग पिथौरागढ़।
जंतु विज्ञानियों ने यारसा गंबू का वानस्पतिक नाम कारडिसेप्स साइनेंनसिक दिया है। यारसा गंबू को इंटोमोफिलस समूह के अंतर्गत हाइपोसेडेल्ज परिवार का सदस्य बताया गया है। यह काले रंग का तंतुकार कवक है, जो 3200 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। यह कवक लारवा पर परजीवी के रूप में संक्रमण करता है। यारसा गंबू करीब साढ़े तीन लाख रुपये किलो मिलती है।
कैसे बनता है यारसा गंबू
अध्ययन के अनुसार बसंत ऋतु की समाप्ति के समय कवक का तंतुजाल लारवा को संक्रमित करता है तथा ग्रीष्म ऋतु शुरू होते ही कवक लारवा को मृत करने के बाद फु्रटिंग बाडी के रूप में शीर्ष भाग से बाहर निकलता है। ऐसा लगता है जैसे कोई घास उगी है। इसी कारण स्थानीय लोग यारसा गंबू को कीड़ा जड़ी कहते हैं। इसकी लंबाई सात से दस सेंटीमीटर तक होती है। चीन के लोगों को तब आश्चर्य हुआ जब जानवरों को यह कवक खिलाने से उनकी क्षमता असाधारण रूप से बढ़ गई।