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पीएम के नाम लेने पर चर्चा में आई ‘सोलो’ संजीवनी
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औषधीय पौधा सोलो।
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ अगस्त को देश के नाम संबोधन में लद्दाख क्षेत्र में पाए जाने वाले सोलो नामक औषधीय पौधे का जिक्र किया था। पीएम के संबोधन के बाद इस पौधे को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। लोग पौधे के गुणों के बारे में जानने को उत्सुक हैं। यह वनस्पति थकान और मानसिक तनाव तो दूर करती ही है। इस बूटी को खाने से भूख भी कम लगती है। हाई एल्टीट्यूड सिकनेस में भी यह कारगर है। यह औषधीय पौधा पिथौरागढ़ जिले के चीन सीमा से सटे लिपुलेख दर्रे के आसपास भी पाया जाता है।
पीएम ने इस औषधि को लद्दाख की संजीवनी बूटी बताया था। कहा था कि सोलो नाम के इस पौधे का उपयोग फौजियों के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए संजीवनी बूटी के रूप में किया जा रहा है। सोलो नाम की यह वनस्पति लद्दाख में 18000 फुट की ऊंचाई पर खारदुंगला, चांगला और पेजिला नामक घाटियों और कुमाऊं-गढ़वाल के हाई एटीट्यूड क्षेत्रों में पाई जाती है। लद्दाखी इसे अपने भोजन में भी प्रयोग करते हैं जिसे वे तंगथूर कहते हैं। इसकी तीन प्रजातियां सफेद, लाल और पीले रंग में हैं, जिन्हें क्रमश: सोलो कार्पो, सोलो मार्पो और सोलो सेरपो के नाम से जाना जाता है।
अद्भुत एडेप्टोजेनिक गुण पाए जाते हैं इस पौधे में
उत्तराखंड आयुर्वेेद विवि देहरादून के आयुर्वेदाचार्य डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) ने बताया कि लद्दाख के स्थानीय प्रैक्टिशनर और वैद्य इस वनस्पति का प्रयोग दवाओं के रूप में करते हैं। इसका लेटिन नाम रोडीयोला है। इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। इस पौधे में विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को जीवित रखने की अद्भुत एडेप्टोजेनिक गुण पाए जाते हैं। इसके इसी गुण के कारण यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्य करने वाले फौजियों को लो ऑक्सीजन प्रेशर के कारण होने वाली समस्याओं से बचाता है।
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पौधे के व्यावसायिक इस्तेमाल की योजना
लेह स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च में इस पौधे पर 10 वर्ष से शोध किया जा रहा है। इस पौधे के व्यावसायिक इस्तेमाल की योजना बनाई जा रही है। अमेरिका की सेंटर फॉर कॉम्प्लीमेंट्री एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ ने इस पौधे पर शोध कर इसे मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करने वाला पाया है। हाईएल्टीट्यूड सिकनेस के लिए तिब्बत में इसकी पत्तियों को सुखाकर तंगथूर पिल नाम की दवा बनाई जाती है। - डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून
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पीएम ने इस औषधि को लद्दाख की संजीवनी बूटी बताया था। कहा था कि सोलो नाम के इस पौधे का उपयोग फौजियों के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए संजीवनी बूटी के रूप में किया जा रहा है। सोलो नाम की यह वनस्पति लद्दाख में 18000 फुट की ऊंचाई पर खारदुंगला, चांगला और पेजिला नामक घाटियों और कुमाऊं-गढ़वाल के हाई एटीट्यूड क्षेत्रों में पाई जाती है। लद्दाखी इसे अपने भोजन में भी प्रयोग करते हैं जिसे वे तंगथूर कहते हैं। इसकी तीन प्रजातियां सफेद, लाल और पीले रंग में हैं, जिन्हें क्रमश: सोलो कार्पो, सोलो मार्पो और सोलो सेरपो के नाम से जाना जाता है।
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अद्भुत एडेप्टोजेनिक गुण पाए जाते हैं इस पौधे में
उत्तराखंड आयुर्वेेद विवि देहरादून के आयुर्वेदाचार्य डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) ने बताया कि लद्दाख के स्थानीय प्रैक्टिशनर और वैद्य इस वनस्पति का प्रयोग दवाओं के रूप में करते हैं। इसका लेटिन नाम रोडीयोला है। इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। इस पौधे में विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को जीवित रखने की अद्भुत एडेप्टोजेनिक गुण पाए जाते हैं। इसके इसी गुण के कारण यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्य करने वाले फौजियों को लो ऑक्सीजन प्रेशर के कारण होने वाली समस्याओं से बचाता है।
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पौधे के व्यावसायिक इस्तेमाल की योजना
लेह स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च में इस पौधे पर 10 वर्ष से शोध किया जा रहा है। इस पौधे के व्यावसायिक इस्तेमाल की योजना बनाई जा रही है। अमेरिका की सेंटर फॉर कॉम्प्लीमेंट्री एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ ने इस पौधे पर शोध कर इसे मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करने वाला पाया है। हाईएल्टीट्यूड सिकनेस के लिए तिब्बत में इसकी पत्तियों को सुखाकर तंगथूर पिल नाम की दवा बनाई जाती है। - डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून