पहाड़ से पलायन रोकने के प्रयास हों
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1958 में ‘कोसी का घटवार’ जैसी कालजयी कहानी लिखने वाले 77 वर्षीय बुजुर्ग साहित्यकार शेखर जोशी पहाड़ के गांवों के लगातार खाली होने से खासे चिंतित हैं। उनकी ओलियागांव शीर्षक से अगली कहानी छपने वाली है, इसमें अल्मोड़ा जिले के अंतर्गत कहानीकार शेखर जोशी के गांव की व्यथा का चित्रण होगा। शेखर जोशी की आंखें कमजोर हो गई हैं, इसलिए वह ओलियागांव शीर्षक कहानी को किसी दूसरे के डिक्टेट (मुंह से बोलकर लिखाना) कर लिखा रहे हैं। ओलियागांव अल्मोड़ा जिले में रनमन से आगे कोसी नदी के किनारे गणानाथ होते हुए थोड़ा आगे पड़ता है। वह बताते हैं कि ओलियागांव में अब 12 खन्यार (खंडहर) हो गए हैं। ज्यादातर घरों में ताले लटक गए हैं। यह विडंबना पहाड़ के अन्य गांवों के साथ ही है।
‘कोसी का घटवार’ कहानी के बारे में उन्होंने बताया कि वह इस कहानी के पात्र किसी गुसाई और लछिमा को नहीं जानते थे। यह फौज में जाने वाले ऐसे सिपाही के जीवन से जुड़ी कहानी है, जो कभी विवाह नहीं करता। वह गांव की लछिमा से प्यार करता है। जब लछिमा की शादी किसी दूसरे युवक से हो जाती है तो गुसाई सिंह टूट जाता है। वह कहते हैं कि सेना में जाने के बाद कई लोग लापता हो जाते हैं और कई शहीद हो जाते हैं, लेकिन उनके परिवार के पास हर महीने आने वाला मनीआर्डर यह आभास कराता रहता है कि अभी उनका बेटा जिंदा है।
इस कहानी में प्रेम भी है और पीड़ा भी है। वह कहते हैं कि यह कहानी पहाड़ के कहानीकार की मनोवृत्ति का भी चित्रण करती है। शेखर जोशी ने बाद में औद्योगिक परिवेश में रहने वालों के पारिवारिक रिश्तों पर आधारित कहानी लिखी थी। डांगरीवाले शीर्षक की इस कहानी ने पहली बार उद्योगों में काम करने वालों की पीड़ा को व्यक्त किया। 57 वर्ष तक इलाहाबाद में रहने के बाद शेखर जोशी इस समय अब अपने बेटों संजय और प्रतुल के साथ गाजियाबाद और लखनऊ में रहते हैं। कभी कभार वह पहाड़ की तरफ भी आ जाते हैं।
अपने बेटे के घुमंतू सिनेमा कार्यक्रम में शामिल होकर पिथौरागढ़ पहुंचे शेखर जोशी ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि वह इस समय कुमाऊंनी में निबंध और लघु कथाएं लिख रहे हैं। पहाड़ के गांवों से लगातार हो रहे पलायन पर उन्होंने गहरी चिंता जताई। कहा कि इसे रोकने का प्रयास होना चाहिए।
‘बदबू’ कहानी ने बड़ी ख्याति पाई
शेखर जोशी ने 1970 में ‘बदबू’ शीर्षक से कहानी लिखी थी। इसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी मैगजीन में अंग्रेजी में अनुवाद कर छापा था। ‘बदबू’ कहानी का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। वह कहते हैं कि यह कहानी जीवन की सच्चाई को करीब लाने वाली रचना है। इसमें महानगरीय जीवन का चित्रण किया गया है।