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टुणेत के पास 113 साल से सही हालत में है पुल
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
Updated Fri, 24 Mar 2017 10:24 PM IST
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थल के पास 113 वर्ष पुराना डांठ पुल
- फोटो : अमर उजाला
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पैदल पुलों के निर्माण में भी अब सीमेंट, सरिया जैसी सामग्री का उपयोग होता है। ऐसे पुलों को हमेशा मरम्मत की जरूरत पड़ती है। पहाड़ की सड़कों पर तो सारे मोटर पुल सीमेंट और सरिया से ही बनाए जाते हैं। इनमें से कई खतरे की जद में आने लगे हैं, लेकिन कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग पर टुणेत के पास बहने वाले नाले पर 1904 में बना डांठ पुल आज भी सही हालत में है। 113 वर्षों में कभी भी इस पुल की मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ी।
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बताया जाता है कि पहले पुलों के निर्माण के समय सीमेंट और सरिया का कतई इस्तेमाल नहीं होता था। पुराने नौलों के निर्माण के समय भी इसी तरह की तकनीक अपनाई जाती थी। इसमें पत्थरों को इस तरह जोड़ा जाता था कि वह एक-दूसरे से अच्छी तरह चिपक जाते थे। सभी पत्थरों को रोकने के लिए एक की स्टोन (चाबी का पत्थर) लगाया जाता है। उसके बाद ऐसे पुल वर्षों तक उसी हालत में रहते हैं। 1980 तक इस पैदल मार्ग की देखरेख के लिए लोनिवि के मजदूर लगाए जाते थे, लेकिन बाद में मजदूर हटा दिए गए। अब रास्ते के साथ-साथ पुल में भी घास, फूस जमने लगी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण की इस बेहतरीन तकनीक को संरक्षित करने का प्रयास होना चाहिए और नए इंजीनियरों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए।
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इस विरासत को बचाया जाए
थल के समाजसेवी हरीश चंद्र जोशी का कहना है कि डांठ पुल एक विरासत है। निर्माण की इस अद्भुत तकनीक को संरक्षित करने की जरूरत है। आज के दौर में पुलों के निर्माण में जिस तरह घटिया सामग्री का प्रयोग हो रहा है वह गंभीर चिंता का विषय है। सरकार को चाहिए कि फिर से इस तकनीक को बढ़ावा दे।
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इंजीनियरों को सीख लेनी चाहिए
क्षेत्र पंचायत सदस्य सुंदरी वर्मा का कहना है कि पुराने समय की इस तकनीक से आज के इंजीनियरों को सीख लेनी चाहिए। वह कहती हैं कि पुराने समय में भवन भी उच्च तकनीक और भूकंपरोधी बनते थे। आज भवनों का वजन तो बढ़ा दिया जाता है, लेकिन उनमें मजबूती का कोई ध्यान नहीं दिया जाता। पुरानी तकनीक आज की जरूरत है।