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मदकोट में लौटी सामूहिकता की परंपरा

Mon, 28 Jan 2019 11:27 PM IST
kamlesh kamlesh अमर उजाला ब्यूरो, मदकोट (पिथौरागढ़)।
अमर उजाला ब्यूरो, मदकोट (पिथौरागढ़)। Published by: kamlesh kamlesh Updated Mon, 28 Jan 2019 11:27 PM IST
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Tradition of returning to Madakot community
मदकोट में विवाह के लिए धान की कुटाई और गेहूं की सफाई करती महिलाएं। - फोटो : AMAR UJALA
 कभी पहाड़ में सामूहिकता की परंपरा लोगों में कूट-कूट कर भरी होती थी। अब भी है लेकिन पहले जैसे बात अब नहीं रही। लोग विवाह, नामकरण, जनेऊ आदि संस्कारों के लिए गांव में ही अनाज जुटाते थे। इस परंपरा पर लगभग विराम लग गया है। इस परंपरा को मदकोट क्षेत्र के बड़े किसान 81 वर्षीय जोगा सिंह धामी ने फिर पुनर्जीवित करने का काम किया है।  
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बुजुर्ग जोगा सिंह धामी के पोते पंकज सिंह का 28 जनवरी को चौना निवासी जोगा सिंह की पुत्री पिंकी के साथ हुई। इस विवाह कार्यक्रम की खास बात यह रही कि परिवार ने पुरानी परंपरा को संजोने का काम किया। जोगा सिंह पोते के विवाह में अपने खेतों में पैदा अनाज नाते, रिश्तेदारों को खिलाया।  इसके लिए गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से एकत्र होकर गेहूं साफ किए। ओखल में धान कूटे गए। इसी अनाज से विवाह के दिन पकवान बनाए। क्षेत्र के लोग बताते हैं कि यह परंपरा लगभग लुप्त हो गई थी। लोग बाजार से खरीदे गए अनाज से विवाह आदि कार्यक्रम संपन्न कराते हैं। कहते हैं कि 35 साल बाद इस तरह की सामूहिकता देखने को मिली।  
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बुजुर्ग जोगा सिंह धामी बताते हैं कि प्राचीन समय में जो लोग बारात में जाते थे। उनसे एक-एक आना जमा किया जाता था। इस रकम को ढोल वादकों को दिया जाता था। बताते हैं कि उस जमाने में पंडित को एक से दो रुपया तक दक्षिणा दी जाती थी। विवाह आदि समारोहों में शराब का बिल्कुल प्रचलन नहीं था। प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं होती थी। रिंगाल के छोटे-छोटे गट्ठर बनाकर उनको जलाकर उजाला किया जाता था। दूल्हे की पोशाक सफेद कुर्ता, पायजामा होता था। दुल्हन की पोशाक चोली, घाघरा हुआ करता था। कहते हैं कि सामूहिकता की भावना होने से गरीबों को भी गरीबी का एहसास नहीं होता था। वह दिन काफी अच्छे थे।        
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