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टिटहरी पक्षी की संख्या में आई तीस फीसदी की कमी
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पिथौरागढ़। जिले में टिटहरी की संख्या में 30 साल में 30 फीसदी की कमी आई है। नदियों और तालाबों के पास बढ़े प्रदूषण को इसका कारण बताया गया है। इस पर प्रकृति प्रेमियों ने चिंता जताई है।
विंग्स संस्था लंबे समय से जिले में पाई जाने वाली पक्षियों के संरक्षण के लिए काम कर रही है। संस्था के विशेषज्ञों ने अध्ययन में पाया कि 30 साल पहले टिटहरी जिन नदी, तालाबों के आसपास बहुतायत में दिखतीं थी लेकिन अब वह अपने आवास के लिए संघर्ष कर रही है। नदी, तालाबों में सीवर की गंदगी, अजैविक कूड़ा, मानवीय हस्तक्षेप इनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ है।
इस वजह से इनकी संख्या घट रही है। टिटहरी का अंग्रेजी नाम लैपविंग और वैज्ञानिक नाम रेड वॉटल्ड लैपविंग है। भारत के सभी प्रदेशों में टिटहरी पाई जाती है। भारत में इसकी चार प्रजातियां ही पाई जाती हैं जबकि पिथौरागढ़ में तीन प्रजातियां हैं। हालांकि इस पक्षी पर कोई विशेष शोध या खोज नहीं की गई है।
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देश में सलेटी टिटहरी लुप्तप्राय है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एवं नेचुरल रिर्सोसेस (आईयूसीएन) ने वर्ष 2006 में जारी रेड बुक में सलेटी टिटहरी को लुप्त श्रेणी में रखा है। पिथौरागढ़ में टिटहरी पनार, घाट, रई, ठुलीगाड़, पपदेव क्षेत्र, महाविद्यालय के आसपास दिखाई देती हैं।
घाट और पनार क्षेत्र में रिवर लैपविंग भी पाई जाती है। यलो लैपविंग कभी कभार दिखाई देती है। इन सभी को टिटहरी के नाम से जाना जाता है। इसका आकार-प्रकार बगुले से मिलता, जुलता है। गर्दन बगुले सी छोटी होती है। सिर और गर्दन के ऊपर की तरफ और गले के नीचे का रंग काला होता है।
इसके पंखों का रंग चमकीला कत्थई होता है। सिर से गर्दन के दोनों ओर सफेद रंग की एक चौड़ी पट्टी होती है। दोनों आंखों के पास एक गूदेदार रचना पाई जाती है। यह मनमौजी पक्षी खुले स्थान पर कीड़े-मकोड़े खाना पसंद करता है।
मार्च से अगस्त तक प्रजनन काल
पिथौरागढ़। टिटहरी मार्च से अगस्त के बीच दो से चार तक अंडे देती है। अंडों से 28 से 30 दिन में बच्चे निकल आते हैं। टिटहरी के अंडों का रंग मटमैला होता है। इस कारण इनके अंडों पर दूसरों की नजर कम पड़ती है।
इसके बच्चों का रंग भी धरती के रंग जैसा ही होता है। नर और मादा दोनों मिलकर बच्चों को पालते हैं। इसकी लंबाई 11 से 13 इंच तक होती है। इनके शरीर का भार 128 से 330 ग्राम तक होता है। बेहद सजग टिटहरी हल्की से आहट या किसी जानवर को देखकर शोर मचानेे लगती है। (संवाद)
टिटहरी संबंधी कई किंवदंतियां भी प्रचलित
पिथौरागढ़। टिटहरी जुड़ी कई किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। बुजुर्गों के अनुसार जिस वर्ष टिटहरी जितने अंडे देती है, उतने माह तक भरपूर बारिश होती है।
कहा जाता है कि टिटहरी नदी, नालों, तालाब, खेतों के किनारे ही अंडे देती है। पानी के किनारों से जितना दूर वह अंडे देती है, बारिश उतनी अधिक होने की संभावना है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
पहले नदियां साफ थीं, लेकिन आबादी बढ़ने के साथ इन छोटी-छोटी नदियों में सीवर, बाथरूम की गंदगी और अजैविक कूड़ा छोड़ दिया है। यह प्रदूषण नदियों और तालाबों का इको सिस्टम खत्म कर रहा है। इस कारण पिछले 30 सालों की अपेक्षा इन पक्षियों की संख्या में 30 फीसदी की कमी आई है।
- जगदीश भट्ट, विंग्स संस्था, निदेशक।
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विंग्स संस्था लंबे समय से जिले में पाई जाने वाली पक्षियों के संरक्षण के लिए काम कर रही है। संस्था के विशेषज्ञों ने अध्ययन में पाया कि 30 साल पहले टिटहरी जिन नदी, तालाबों के आसपास बहुतायत में दिखतीं थी लेकिन अब वह अपने आवास के लिए संघर्ष कर रही है। नदी, तालाबों में सीवर की गंदगी, अजैविक कूड़ा, मानवीय हस्तक्षेप इनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ है।
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इस वजह से इनकी संख्या घट रही है। टिटहरी का अंग्रेजी नाम लैपविंग और वैज्ञानिक नाम रेड वॉटल्ड लैपविंग है। भारत के सभी प्रदेशों में टिटहरी पाई जाती है। भारत में इसकी चार प्रजातियां ही पाई जाती हैं जबकि पिथौरागढ़ में तीन प्रजातियां हैं। हालांकि इस पक्षी पर कोई विशेष शोध या खोज नहीं की गई है।
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देश में सलेटी टिटहरी लुप्तप्राय है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एवं नेचुरल रिर्सोसेस (आईयूसीएन) ने वर्ष 2006 में जारी रेड बुक में सलेटी टिटहरी को लुप्त श्रेणी में रखा है। पिथौरागढ़ में टिटहरी पनार, घाट, रई, ठुलीगाड़, पपदेव क्षेत्र, महाविद्यालय के आसपास दिखाई देती हैं।
घाट और पनार क्षेत्र में रिवर लैपविंग भी पाई जाती है। यलो लैपविंग कभी कभार दिखाई देती है। इन सभी को टिटहरी के नाम से जाना जाता है। इसका आकार-प्रकार बगुले से मिलता, जुलता है। गर्दन बगुले सी छोटी होती है। सिर और गर्दन के ऊपर की तरफ और गले के नीचे का रंग काला होता है।
इसके पंखों का रंग चमकीला कत्थई होता है। सिर से गर्दन के दोनों ओर सफेद रंग की एक चौड़ी पट्टी होती है। दोनों आंखों के पास एक गूदेदार रचना पाई जाती है। यह मनमौजी पक्षी खुले स्थान पर कीड़े-मकोड़े खाना पसंद करता है।
मार्च से अगस्त तक प्रजनन काल
पिथौरागढ़। टिटहरी मार्च से अगस्त के बीच दो से चार तक अंडे देती है। अंडों से 28 से 30 दिन में बच्चे निकल आते हैं। टिटहरी के अंडों का रंग मटमैला होता है। इस कारण इनके अंडों पर दूसरों की नजर कम पड़ती है।
इसके बच्चों का रंग भी धरती के रंग जैसा ही होता है। नर और मादा दोनों मिलकर बच्चों को पालते हैं। इसकी लंबाई 11 से 13 इंच तक होती है। इनके शरीर का भार 128 से 330 ग्राम तक होता है। बेहद सजग टिटहरी हल्की से आहट या किसी जानवर को देखकर शोर मचानेे लगती है। (संवाद)
टिटहरी संबंधी कई किंवदंतियां भी प्रचलित
पिथौरागढ़। टिटहरी जुड़ी कई किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। बुजुर्गों के अनुसार जिस वर्ष टिटहरी जितने अंडे देती है, उतने माह तक भरपूर बारिश होती है।
कहा जाता है कि टिटहरी नदी, नालों, तालाब, खेतों के किनारे ही अंडे देती है। पानी के किनारों से जितना दूर वह अंडे देती है, बारिश उतनी अधिक होने की संभावना है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
पहले नदियां साफ थीं, लेकिन आबादी बढ़ने के साथ इन छोटी-छोटी नदियों में सीवर, बाथरूम की गंदगी और अजैविक कूड़ा छोड़ दिया है। यह प्रदूषण नदियों और तालाबों का इको सिस्टम खत्म कर रहा है। इस कारण पिछले 30 सालों की अपेक्षा इन पक्षियों की संख्या में 30 फीसदी की कमी आई है।
- जगदीश भट्ट, विंग्स संस्था, निदेशक।