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जहां फोन की घंटी ही नहीं बजती, वहां पेटीएम की कौन सोचे

Fri, 02 Dec 2016 10:04 PM IST
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला Updated Fri, 02 Dec 2016 10:04 PM IST
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The phone never rings the bell, he who thinks of Paytm
कैलाश यात्रा मार्ग का प्रमुख पड़ाव गुंजी, जहां संचार की कोई सुविधा नहीं - फोटो : अमर उजाला

नोटबंदी के बाद बैंकों में हो रही करेंसी की किल्लत के बाद सरकार बार-बार लोगों को इस बात के लिए प्रेरित कर रही है कि वह कैशलेस अर्थव्यवस्था को अपनाएं। ई-वॉलेट के व्यापक प्रचार की बातें हो रही हैं। इससे पहले डिजिटल इंडिया का नारा भी दिया गया था, लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि अभी कई इलाके ऐसे हैं, जहां पर फोन की घंटी तक नहीं बजती।

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मोबाइल और लैंडलाइन फोनसेवा तो इन गांवों के लिए सपना हो गई है। नेपाल की संचार कंपनियों के सिम अपनी जरूरत के लिए उपयोग में लाने वाले दारमा, चौदांस और व्यांस घाटी के लोगों के लिए कम से कम पेटीएम का कोई अर्थ नहीं है। सरकार जो भी नीति बनाती है वह महानगरों के हिसाब से ही पूरे देश में लागू कर देती है। दारमा घाटी के दर, बोंगलिंग, खेला, नागलिंग, बालिंग, गो, बोन, चल, दुग्तू, दांतू, खांकर, सीपू, मार्छा में तो स्थिति यह है कि वहां नेपाली संचार कंपनियों का नेटवर्क भी नहीं पकड़ता।
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इसी तरह चौदांस घाटी के पांगू, रौतो, रिमझिम, देकांग, हिमखोला, छलमाछिलासूं, नारायणआश्रम, जयकोट, नयंग, पस्ती, सिर्खा, सिर्दांग, समरी, रूंग, तीजम, माकमकैलाश में किसी भारतीय संचार कंपनी की कोई सेवा नहीं है। व्यास घाटी में पड़ने वाले कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव गुंजी समेत बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, नाभी, रौंगकांग, कुटी में भी कोई नेटवर्क काम नहीं करता। इन गांवों के लोग जरूरत पड़ने पर नेपाली सिम का उपयोग करते हैं। इन गांवों में रहने वालों के लिए सबसे बड़ी समस्या रसोईगैस का सिलेंडर बुक करने में आती है।
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इंडियन ऑयल कारपोरेशन ने अब रसोईगैस सिलेंडर की काउंटर बुकिंग बंद कर दी है। बुकिंग के लिए फोन का ही प्रयोग होता है। ऐसे में रसोईगैस का सिलेंडर बुक कराने के लिए इन गांवों के लोगों को 60 किलोमीटर दूर धारचूला आकर अपने फोन से सिलेंडर बुक कराना पड़ता है। क्षेत्र के लोग कहते हैं कि सरकार पेटीएम, कैशलेस व्यवस्था को शुरू करे, लेकिन पहले संचार सुविधा से वंचित गांवों में किसी कंपनी की सेवा भी शुरू करे।


छोटा कैलाश में चढ़ावे का डेढ़ लाख फंसा
कुटी गांव के लोग हर साल छोटा कैलाश मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर में चढ़ावे के तौर पर 500 और 1000 के कई नोट चढ़ाए गए। इस चढ़ावे को अगले साल की पूजा के समय निकाला जाता है और धारचूला लाकर बैंक खाते में जमा किया जाता है। इस बार सितंबर में हुई विशेष पूजा के बाद पूरी चढ़ावे की रकम मंदिर में ही रह गई। एक अनुमान के अनुसार इसमें 1000 और 500 के नोटों की करीब डेढ़ लाख रुपए की रकम है। कुटी की प्रधान सरिता देवी और गांव के गुलाब सिंह ने बताया कि नोटबंदी के कारण मंदिर में चढ़ावे की यह रकम बेकार हो गई है।

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