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मालपा में तब दिखा प्रकृति का रौद्र रूप
दिनेश अवस्थी/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Thu, 16 Aug 2018 10:34 PM IST
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मालपा का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
17 अगस्त 1998 को मालपा में प्रकृति का रौद्र उस समय देखने को मिला, जब कैलाश मानसरोवर यात्री समेत स्थानीय लोग, पोनी-पोर्टर्स गहरी निद्रा में लीन थे। आंधी के बीच अचानक मालपा की पहाड़ी दरकी और पलक झपकते ही दो सौ से अधिक लोग दफन हो गए। मालपा से सात किमी पहले गाला में तब केएमवीएन के दिनेश गुरुरानी तैनात थे। उन्हीं की जुबानी मालपा हादसे की कहानी।
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15 अगस्त 1998 को कैलाश यात्रा के 12वें दल के 60 यात्री ठहरे थे। इनमें मशहूर नृत्यांगना प्रोतिमा वेदी भी थीं। तब गाला में शिव मंदिर बनाने की तैयारी चल रही थी। इसके लिए दिनेश गुरुरानी यात्रियों से सहयोग राशि एकत्र कर रहे थे। असम के यात्री दीपक शर्मा ने उनसे पूछा कि मंदिर निर्माण में कुल कितना खर्चा आएगा। उन्होंने 25025 रुपये की राशि एकत्र कर गुरुरानी को सौंप दी और आगंतुक रजिस्टर में लिख दिया ‘दिस रजिस्टर क्लोज्ड फॉर द शेयर’। इस पर उनसे पूछा ऐसा क्यों लिखा तो वह बोले अब कोई यात्रा नहीं आएगी, जबकि यात्रा के चार बैच और आने थे। गाइड विनोद लोहनी और पदमेश शर्मा रात को सोए थे। इस पर दीपक ने फिर कहा पहाड़ दरक गया तो यह ऐसे ही सोता रहेगा। पोर्टर नैन सिंह मस्त होकर नाच रहा था। वह सुबह गाला से मालपा रवाना होने से पहले गले मिला और कहा कि शायद फिर मौका मिले ना मिले।
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यात्री 16 अगस्त को मालपा को रवाना हुए। 17 अगस्त को यात्रियों को बूंदी निकलना था और आठवें दल को वापसी में गाला आना था। इस दिन मालपा में किसी भी दल के रुकने का शेड्यूल तय नहीं था। 17 अगस्त की सुबह यात्री मालपा से बूंदी की यात्रा पर रवाना हुए। मालपा नाला आने के चलते यात्री लौटकर फिर से मालपा कैंप में पहुंच गए। रात को नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी ने अपना नृत्य दिखाया। गुरुरानी को भी शिव मंदिर के लिए टिन लेने मालपा जाना था, लेकिन कुक हरीश आर्या ने उन्हें रोक दिया कि दोपहर के 12 बज गए हैं अब लौटने में रात हो जाएगी। इस पर उन्होंने अपना विचार बदल दिया।
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रात 11:30 बजे के करीब मालपा से एक व्यक्ति गाला कैंप पहुंचा। उसने खुद को आरईएस का जेई बताते हुए रात बिताने के लिए जगह मांगी। रात को ढाई बजे वायरलेस पर संदेश आया कि मालपा बह गया है। सभी लोग मालपा की ओर भागे वहां का मंजर देख सबकी चीत्कार निकल गई। मालपा पूरी तरह तबाह हो चुका था। आवास गृह के टिन काली नदी को पार कर नेपाल में छितरे हुए थे। मालपा हादसे में करीब 60 यात्रियों के साथ ही करीब 202 लोग दफन हो गए।
मालपा ने दे दी थी पूर्व चेतावनी
पिथौरागढ़। मालपा हादसे के चार-पांच दिन पहले से पहाड़ी से पत्थर गिर रहे थे। यात्रियों और केएमवीएन कर्मियों में इस बात को लेकर चर्चा हो रही थी। बावजूद किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। मालपा की पहाड़ी शायद यात्रियों को चेता रही थी।
पौराणिक मार्ग से ही हो यात्रा
पिथौरागढ। कैलाश यात्रा पहले धारचूला से तवाघाट तक वाहनों से होती थी, इसके बाद यात्री पांगू जाते थे। वहां से सिर्खा, गाला, मालपा, बूंदी होते हुए गुंजी निकलते थे। बाद में इसे बदलकर धारचूला से नारायण आश्रम होते हुए सिर्खा, गाला, मालपा, बूंदी होते हुए गुंजी ले जाया गया। इसे भी बदलकर धारचूला से लखनपुर, बूंदी, गुंजी ले जाया गया। वर्तमान से पिथौरागढ़ से यात्रियों को हेलीकॉप्टरों से सीधे गुंजी ले जाया जा रहा हैं। यात्रा के नोडल अधिकारी दिनेश गुरुरानी कहते हैं कि यात्रा को यदि व्यवस्थित तरीके से चलाना है तो इसे पौराणिक मार्ग से ही किया जाना चाहिए।