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बादलों की बेरुखी से किसान मायूस
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
Updated Thu, 23 Nov 2017 10:27 PM IST
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अमतड़ गांव में सूखे खेतों तक पाइप का पानी पहुंचाने का प्रयास करती महिला
- फोटो : अमर उजाला
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ऊपरी रामगंगा घाटी के दर्जनों गांवों में सैकड़ों हेक्टेयर जमीन के इस बार बंजर रहने की आशंका है। 23 सितंबर के बाद जिले में बारिश न होने से सभी जगह सूखे की स्थिति पैदा होने लगी है। इससे किसान मायूस हैं। इस बार कई गांवों में लोग गेहूं की बुआई नहीं कर पाए हैं। अब गेहूं बुआई का समय निकल गया है। कुछ गांवों में सिंचाई नहरें तो हैं, लेकिन आपदा के समय टूटी इन नहरों की अब तक मरम्मत नहीं हो पाई है।
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पहाड़ पर यदि समय पर बारिश हो तो ठीक दिवाली के समय गेहूं, मसूर, जौ, चना की बुआई हो जाती है। इस समय तक बीज अंकुरित हो जाते हैं, लेकिन इस बार सूखे के कारण गेहूं की बुआई नहीं हो पाई है। अमतड़ गांव में 40 हेक्टेयर जमीन अब तक बंजर पड़ी है। इसी तरह पतेत में 45 हेक्टेयर, बलतिर में 60 हेक्टेयर, गोल में 45 हेक्टेयर, डुंगरी, लेजम, सुगड़ी, अठखेत, तड़ीगांव, मस्मोली में कुल 175 हेक्टेयर जमीन पर अब तक बीज रोपण नहीं हो पाया है। किसानों का कहना है कि यदि सूखे खेतों में बीज डालेंगे तो वह अंकुरित नहीं हो पाएंगे। इससे बीज का नुकसान होगा। वहीं, लेजम, डुंगरी, तड़ीगांव में सिंचाई नहर के टूटने के कारण खेतों में पानी नहीं पहुंच पा रहा है।
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किसान भानी चंद, बलतिर के प्रधान महिराज भैंसोड़ा, लेजम के पूर्व प्रधान विनोद पंत आदि का कहना है कि इस बार मौसम की बेरुखी का असर किसानों पर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि सब्जी उत्पादन का काम भी पानी के अभाव में प्रभावित हो गया है। यदि अब बारिश हो भी जाती है तो उससे कोई फायदा मिलने वाला नहीं है। क्योंकि गेहूं, मसूर, जौ की बुआई का समय अब निकल चुका है।
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अब होने वाली बारिश का फायदा नहीं
पिथौरागढ़। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह का कहना है कि पहाड़ का ज्यादातर फसल चक्र बारिश के पानी पर निर्भर है। यहां पर सिंचाई की सुविधा मात्र 10 फीसदी खेतों में ही उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि असिंचित इलाकों में इस बार बुआई प्रभावित हो गई है। इसका किसानों पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अब यदि जल्दी बारिश होती है तो सिर्फ तिलहनी फसलों और सब्जियों को उगाने में फायदा मिल पाएगा। मुख्य फसल के लिए बारिश का कोई लाभ नहीं होगा।