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अब तक बुनियादी समस्याओं का ही हल नहीं हो पाया
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Sat, 04 Feb 2017 10:34 PM IST
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पिथौरागढ़ में अमर उजाला की चुनाव परिचर्चा में विचार रखते वक्ता
- फोटो : अमर उजाला
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आजादी के 70 साल बाद भी चुनावों को बुनियादी समस्याओं को हल करने के मुद्दे पर ही लड़ा जा रहा है, जबकि सड़क, शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी जैसी मौलिक जरूरतों का हल काफी पहले निकल जाना चाहिए था। अमर उजाला की चुनाव परिचर्चा में शामिल लोग बुनियादी समस्याओं को ही चुनावी मुद्दा बना रहना गलत मानते हैं।
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इसके पीछे उनकी धारणा है कि किसी भी राजनेता ने इन समस्याओं के समाधान के ईमानदार प्रयास नहीं किए। जनता आज भी बुनियादी जरूरतों को पाने के लिए ही परेशान है। यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि सड़क की मांग को लेकर गांवों के लोग चुनाव बहिष्कार जैसा ऐलान कर रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार की स्थिति बेहद चिंताजनक है, जबकि चुनाव के मुद्दे विकास के अगले चरण होने चाहिए, इसमें तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा की सुविधा बढ़े, चिकित्सा की बेहतर सुविधा हो।
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परिचर्चा में एक बात अहम रूप से उभरी कि हर चुनाव में प्रत्याशी पिछले विधायक की कमियों को सामने लाने में ही समय बर्बाद करते हैं। अपनी कार्ययोजना के बारे में स्पष्ट रूप से कोई कुछ नहीं कहता, जबकि दावेदार खुद यह बताए कि उसकी वरीयता क्या होगी। यह भी कहा गया कि चुनाव में धनबल का प्रयोग अच्छी बात नहीं है। दावेदार को चाहिए कि वह अपने काम के दम पर जनता के बीच जाए। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब जबकि विकास के लिए नए रास्तों की तलाश होनी चाहिए थी, पिथौरागढ़ के लोगों को बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा, पलायन जैसे मुद्दों पर ही केंद्रित रहना पड़ रहा है।
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नौजवानों ने कहा कि विधायकों की जवाबदेही तय हो। उनसे समय-समय पर सवाल जवाब किए जाएं। लोग तो यही कहते हैं कि आज भी पिथौरागढ़ में सड़क, शिक्षा, रोजगार ही प्रमुख समस्या है और यही चुनाव का मुद्दा भी है। चुनाव में विकास ही हार-जीत का पहला आधार भी बनेगा। लोगों का यह भी कहना है कि पहाड़ को शिक्षा का हब और मैदान को उद्योगों का हब बनाया जाए और सिर्फ इन बातों को ही घोषणापत्र में शामिल किया जाए।
विकास के लिए परिपक्व सोच होनी चाहिए। बिजली, पानी, सड़क की समस्याओं को ही अब तक उठाना सोचनीय है। अब तो विकास के अगले चरण की बात होनी चाहिए। ऐसा लगता है कि हर चुनाव में पीछे ही मुड़कर देखते जा रहे हैं। -मोहन चंद्र भट्ट, अध्यक्ष बार एसोसिएशन।
यातायात सुधार को प्राथमिकता में रखा जाए। पहाड़ से हो रहे पलायन को रोकने के लिए ठोस नीति बननी चाहिए। अब कम से कम छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ने की बात नहीं होनी चाहिए। लोगों को भी चाहिए कि वह विकास के नए आयामों की बात प्रत्याशी के सामने रखें। -राजेश तिवारी, वकील।
मुद्दों की बात तो तब की जानी चाहिए, जब यह पता हो कि उन मुद्दों पर कितना काम हुआ है। शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर अब तक कोई काम नहीं हुआ है। युवाओं के मुद्दों पर सही सोच होनी जरूरी है। आज भी उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों में जाना पड़ रहा है। -सपना, छात्रा डिग्री कॉलेज।
उच्च शिक्षण संस्थान तो खोल दिए हैं, लेकिन उनमें सही फैकल्टी नहीं हैं। गरीब विद्यार्थियों के लिए इन कॉलेजों में ही शिक्षा लेने की मजबूरी है। विधायक को सबसे पहले शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने की बात करनी होगी। -कंचन खर्कवाल, छात्रा डिग्री कॉलेज।
जब कोई प्रत्याशी हार जाता है तो उसे अपनी सक्रियता कम नहीं करनी चाहिए। वह जनता के बीच रहे। विधायक के कामकाज पर नजर रखे। चुनाव के मौके पर मात्र दूसरे की विफलता को सामने लाने वाली प्रवृत्ति ठीक नहीं है। -करुणा खर्कवाल, छात्रा डिग्री कॉलेज।
शिक्षा का ऐसा माहौल बने कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही अपना हुनर सामने लाने का मौका मिले। सबसे पहले विधायक को यह देखना होगा कि स्थानीय स्तर पर शिक्षा के लिए किस तरह का माहौल है। -पूनम, छात्रा डिग्री कॉलेज।
यह बेहद चिंताजनक है कि अब तक विधानसभा क्षेत्र में यातायात सुविधाओं का सही स्तर पर विकास नहीं हो पाया है। सड़क बना देना ही काफी नहीं है। यह देखा जाए कि उसमें मानक के अनुसार सारा काम हुआ या नहीं। -दिनेश नगरकोटी, व्यापारी।
पिथौरागढ़ में अस्पताल तो है, लेकिन यह रेफर सेंटर बन गया है। हम किस विकास की बात कर रहे हैं। पहले भी लोग चिकित्सा की सुविधा से वंचित थे और आज भी उनको स्थानीय स्तर पर चिकित्सा नहीं मिलती। -पारस मुंडेला, छात्र डिग्री कॉलेज।
सभी को शिक्षा की दिशा में काम करना चाहिए। जब तक हर मजदूर का बच्चा भी पढ़ लिख नहीं लेता, तब तक यही मानना चाहिए कि शिक्षा गरीबों के लिए नहीं है। शिक्षा पर कुछ खास लोगों का अधिकार न हो। -दीपक राजपूत, छात्र डिग्री कॉलेज।
हर योजना के लिए पैसा आने के बाद उसकी मानीटरिंग की जानी चाहिए। ट्रांसफर और तैनाती होने के बाद भी पहाड़ के अस्पतालों में डॉक्टर क्यों नहीं आ रहे हैं, इसकी छानबीन होनी चाहिए। लोगों को साफ पानी मिले, इसकी व्यवस्था हो। -डा. नरेंद्र शर्मा, चिकित्सक।
सबसे पहले नेता को शिक्षित होना चाहिए। राज्य गठन के बाद नेता तो बढ़े, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। हिमाचल प्रदेश को उदाहरण के तौर पर हमारे नेता क्यों नहीं लेते। जनता को चाहिए कि वह सबक सिखाने को नोटा दबाएं। -नरेंद्र चंद, पूर्व सैन्य अधिकारी।
विधानसभा क्षेत्रों की जरूरत के हिसाब से नीति बननी चाहिए। शिक्षा, रोजगार को मुख्य मुद्दे के रूप में रखा जाए। इसे प्रत्याशी अपने घोषणापत्र में भी शामिल करे। तभी क्षेत्र का सही विकास हो पाएगा। -डा. बिपिन जोशी, प्राध्यापक।
नेताओं को पुरानी बातों को रिपीट कर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। जिस मुद्दे पर पांच साल पहले चुनाव लड़ा था, यदि वह इस अवधि में हल नहीं हो पाया तो शर्म की बात है। हर चुनाव में नया मुद्दा होना चाहिए। -अर्जुन कुमार, छात्र डिग्री कॉलेज।
जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वह सरकारी महकमों पर ऐसा प्रभाव डाले कि जनता को परेशानी न हो। विधायक को छोटे-छोटे कामों में शामिल नहीं रहना चाहिए। वह समग्र विकास की सोच रखे। -हिमानी टम्टा, छात्रा डिग्री कॉलेज।
विधानसभा क्षेत्र की जरूरत का अध्ययन करने के बाद ही प्रत्याशी को मैदान में उतरना चाहिए। यदि उसमें समस्या के समाधान का साहस हो तो वह चुनाव लड़े, वर्ना उसे धन और समय खर्च नहीं करना चाहिए। -सीमा, छात्रा डिग्री कॉलेज।
टांग खिंचाई वाली राजनीति को जनता खूब समझती है, लेकिन आश्चर्य होता है कि हर चुनाव में यही स्वभाव देखने को मिलता है। जब हर साल एक ही बात को दोहराना हो तो फिर नए चुनाव का क्या मतलब रह जाता है। -जुगल पांडे, समाजसेवी।