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आपदा से उबरने में लगेंगे दस वर्ष
प्रमोद द्विवेदी/अमर उजाला, मुनस्यारी
Updated Tue, 10 Jul 2018 10:51 PM IST
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मुनस्यारी के हरकोट को इस तरह करनी पड़ रही आवाजाही
- फोटो : अमर उजाला
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वर्ष 2013 की आपदा भले ही राष्ट्रीय आपदा घोषित हुई हो, लेकिन इस बार की आपदा मुनस्यारी विकासखंड के लिए किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है। खेत-खलिहान से लेकर बागवानी तक इस आपदा ने प्रभावित कर दी है। जानकारों का कहना है कि इस त्रासदी से उबरने में मुनस्यारी को कम से कम दस वर्ष लगेंगे।
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वर्ष 2013 की आपदा ने उत्तराखंड को आपदा की चर्चाओं मेें विश्व स्तर तक पहुंचा दिया था। 2013 में मुनस्यारी को जो नुकसान नहीं हुआ वह इस बार देखने को मिल रहा है। मुनस्यारी विकासखंड में आपदा से दो जनहानि हुई हैं, पशु हानि की संख्या भी सीमित है, लेकिन आपदा की त्रासदी ने यहां के लोगों को जो क्षति पहुंचाई है उसका पैरामीटर अब तक हुई आपदाओं में सबसे ऊपर है। मुनस्यारी विकासखंड के भीतर वर्षों से पानी के जो गधेरे नाले के रूप में बहते थे, आज उनका आकार गोरी नदी जैसा हो गया है। इनसे निकले पानी, मलबा और पत्थरों ने हजारों नाली भूमि फसल सहित बर्बाद कर दिया है।
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कोई घर ऐसा नहीं बचा, जिसमें पानी न घुसा हो। खेत का बह जाना, आंगन का दरक जाना, जमीन में दरारें दिखना, आवासीय भवनों की दीवारें चटकना आम बात हो गई है। हालांकि आपदा एक्ट के अनुसार इन नुकसानों को राहत की श्रेणी में नहीं रखा गया है। यह बात सही है कि हजारों परिवारों का जीवन इस आपदा के कारण दांव में लग चुका है। 70 वर्षीय बूंगा निवासी गोकर्ण सिंह मर्तोलिया का कहना है कि अपने विद्यार्थी जीवन के 1962 से वे मुनस्यारी में रहते आ रहे हैं, अब तक उन्होंने ऐसी विनाशकारी आपदा नहीं देखी, जिस आपदा में कोई गांव अछूता नहीं रहा है।
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नाती यो कस कलयुग आग्यो...
80 वर्षीय बसंतकोट निवासी त्रिलोक सिंह का कहना है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में इस तरह की आपदा नहीं देखी, जिसमें इतना नुकसान हुआ हो। सरमोली के 90 वर्षीय भवान सिंह नितवाल के मुताबिक न हमने पुरखों से सुना और न ऐसी आपदा ही देखी। आपदा ने किसी को नहीं छोड़ा है, आम जन जीवन को तहस-नहस कर दिया है। उच्छैती निवासी 95 वर्षीय यशोदा आमा कुमाऊंनी में कहती हैं-नाती यो कस कलयुग आग्यो यो आपदा ले एक लै गों नि बचाय। (नाती कैसा कलियुग आ गया है, इस आपदा से एक भी गांव नहीं बचा)