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सेवा और संघर्ष की सीख दे रहे हैं रिटायर्ड उप प्राचार्य
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
Updated Sat, 30 Sep 2017 10:05 PM IST
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समाज को प्रेरणा दे रहे रिटायर्ड प्राचार्य डा.जोशी दंपति।
- फोटो : अमर उजाला
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देवताओं को असुरों से बचाने के लिए महर्षि दधीचि ने जीते जी अस्थियां दान की थी। मौजूदा दौर में त्याग के उदाहरण बेहद कम हैं। मगर यहां अंतिम सांस लेने के बाद अंगदान को प्रेरित करने वाले बुजुर्ग जरूर हैं। पिथौरागढ़ राजकीय पीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त उप प्राचार्य डॉ. देवीदत्त जोशी (74) और उनकी पत्नी भागीरथी जोशी (67) देहदान के लिए तैयार हैं। गरीब और जरूरतमंद को शरीर के अंगदान करने के इरादे से 2013 में पंजीकरण भी कराया है। बताते हैं कि एक डॉक्टर दंपति के देहदान से प्रेरित होकर इस दंपति ने भी शरीर के सभी अंगदान देने का संकल्प लिया। उनके इस कार्य के बाद पांच अन्य लोगों ने भी अंगदान फैसला लिया।
चंपावत के भैरवां मोहल्ला में अपनी पत्नी और बेटी व दामाद के साथ रह रहे डॉ. जोशी चौथे पड़ाव में भी जिंदादिली से जिंदगी जी रहे हैं। उनके बेटे नीरज लखनऊ में प्रकाशन के काम से जुड़े हैं। 14 साल पूर्व सेवानिवृत्त होने के बाद बेटे के साथ रहने के बजाय माटी के मोह से वह चंपावत में ही रह रहे हैं। अलबत्ता यदा-कदा बेटे के पास जरूर जाते हैं। अनुशासित दिनचर्या और संयमित जीवन शैली से इस उम्र में भी वे न केवल चलते-फिरते हाल में हैं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी लगे हैं।
चेतना मंच का गठन कर उन्होंने चंपावत में सर्किट हाउस, रोडवेज बस स्टेशन, जिला अस्पताल को खुलवाने के लिए मुखर हो आवाज उठाई। इस वक्त भी वे छात्र और नौजवानों को भविष्य निर्माण के टिप्स दे रहे हैं। वैसे डॉ. जोशी कई शिक्षण व सामाजिक संस्थाओं के सदस्य के अलावा केंद्र पोषित जवाहर नवोदय विद्यालय प्रबंधन समिति, पुलिस विभाग की स्वैच्छिक ब्यूरो, किशोर न्याय बोर्ड, रेड रिबन क्लब में रह चुके हैं। उनका कहना है कि जीवन का चौथा पढ़ाव बोझ नहीं है। अपने ज्ञान व अनुभवों को समाज को बांट जिंदगी की राह भी खुशनुमा हो जाती है।
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एक भी वृद्धावस्था आश्रम नहीं
देश व प्रदेश की तरह ही चंपावत जिले में भी एकाकी या बच्चों द्वारा पीठ करने से उपेक्षा भरी जिंदगी जीने वाले बुजुर्गों की तादात बढ़ रही है। बच्चों के लिए जिंदगी खफाने वाले बुजुर्ग जीवन की सांझ में अलग-थलग रहने को मजबूर हैं। इनकी संतानें नौकरी या दूसरी वजहों से माता-पिता को साथ न रखने को मजबूर हैं। मगर कुछ ऐसे भी हैं, जो बड़े-बुजुर्गों के प्रति फर्ज को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। ऐसे में वृद्धों की बेबसी भी बढ़ रही है। जिले की 2.65 लाख की आबादी में 24 हजार बुजुर्ग हैं। इनमें चार हजार लोग सेवानिवृत्त पेंशनर हैं। सरकारी तौर पर भी बुजुर्गों की अनदेखी हो रही है। यहां एक भी सरकारी अथवा गैर सरकारी वृद्धावस्था विश्रामगृह नहीं है। जिला समाज कल्याण अधिकारी बीडी पंत का कहना है कि वृद्धावस्था होम केयर के प्रस्ताव पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
वृद्धावस्था पेंशन की लाइन में हैं 13 हजार लोग
जिले में 12938 लोग वृद्धावस्था पेंशन के लिए पंजीकृत हैं। जिला समाज कल्याण अधिकारी बीडी पंत का कहना है कि इस वक्त इनमें से 11698 लोगों को पेंशन मिल रही है। शेष 1240 बुजुर्गों को आधार लिंक नहीं होने की वजह से पेंशन नहीं मिल पा रही है।
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चंपावत के भैरवां मोहल्ला में अपनी पत्नी और बेटी व दामाद के साथ रह रहे डॉ. जोशी चौथे पड़ाव में भी जिंदादिली से जिंदगी जी रहे हैं। उनके बेटे नीरज लखनऊ में प्रकाशन के काम से जुड़े हैं। 14 साल पूर्व सेवानिवृत्त होने के बाद बेटे के साथ रहने के बजाय माटी के मोह से वह चंपावत में ही रह रहे हैं। अलबत्ता यदा-कदा बेटे के पास जरूर जाते हैं। अनुशासित दिनचर्या और संयमित जीवन शैली से इस उम्र में भी वे न केवल चलते-फिरते हाल में हैं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी लगे हैं।
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चेतना मंच का गठन कर उन्होंने चंपावत में सर्किट हाउस, रोडवेज बस स्टेशन, जिला अस्पताल को खुलवाने के लिए मुखर हो आवाज उठाई। इस वक्त भी वे छात्र और नौजवानों को भविष्य निर्माण के टिप्स दे रहे हैं। वैसे डॉ. जोशी कई शिक्षण व सामाजिक संस्थाओं के सदस्य के अलावा केंद्र पोषित जवाहर नवोदय विद्यालय प्रबंधन समिति, पुलिस विभाग की स्वैच्छिक ब्यूरो, किशोर न्याय बोर्ड, रेड रिबन क्लब में रह चुके हैं। उनका कहना है कि जीवन का चौथा पढ़ाव बोझ नहीं है। अपने ज्ञान व अनुभवों को समाज को बांट जिंदगी की राह भी खुशनुमा हो जाती है।
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एक भी वृद्धावस्था आश्रम नहीं
देश व प्रदेश की तरह ही चंपावत जिले में भी एकाकी या बच्चों द्वारा पीठ करने से उपेक्षा भरी जिंदगी जीने वाले बुजुर्गों की तादात बढ़ रही है। बच्चों के लिए जिंदगी खफाने वाले बुजुर्ग जीवन की सांझ में अलग-थलग रहने को मजबूर हैं। इनकी संतानें नौकरी या दूसरी वजहों से माता-पिता को साथ न रखने को मजबूर हैं। मगर कुछ ऐसे भी हैं, जो बड़े-बुजुर्गों के प्रति फर्ज को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। ऐसे में वृद्धों की बेबसी भी बढ़ रही है। जिले की 2.65 लाख की आबादी में 24 हजार बुजुर्ग हैं। इनमें चार हजार लोग सेवानिवृत्त पेंशनर हैं। सरकारी तौर पर भी बुजुर्गों की अनदेखी हो रही है। यहां एक भी सरकारी अथवा गैर सरकारी वृद्धावस्था विश्रामगृह नहीं है। जिला समाज कल्याण अधिकारी बीडी पंत का कहना है कि वृद्धावस्था होम केयर के प्रस्ताव पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
वृद्धावस्था पेंशन की लाइन में हैं 13 हजार लोग
जिले में 12938 लोग वृद्धावस्था पेंशन के लिए पंजीकृत हैं। जिला समाज कल्याण अधिकारी बीडी पंत का कहना है कि इस वक्त इनमें से 11698 लोगों को पेंशन मिल रही है। शेष 1240 बुजुर्गों को आधार लिंक नहीं होने की वजह से पेंशन नहीं मिल पा रही है।