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Pithoragarh News: संशोधित = अव्यवस्थाओं के पतझड़ में 14 घंटे पेट दर्द से कराहता रहा बसंत
Mon, 04 Aug 2025 11:12 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Mon, 04 Aug 2025 11:12 PM IST
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बंगापानी तहसील के मेतली गांव के बीमार युवक को लठ्ठे और चादर के सहारे अंधेरी रात में मुख्य सड़क
बंगापानी (पिथौरागढ़)। विकास के दावे पहाड़ पर आते-आते हांफ जाते हैं। आए दिन बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर और खबरें सामने आ रही हैं। मरीज का नाम बदल रहा है। तस्वीर बदल रही है। क्षेत्र बदल रहा है लेकिन समस्याएं और हालात ग्रामीणों के लिए वही पुराने हैं। ताजा मामला बंगापानी के दूरस्थ गांव मेतली का है। यहां एक मरीज को पेट दर्द के इलाज के लिए जिन हालातों से जूझना पड़ा उस बेबसी और पीड़ा को शहरी क्षेत्र के सुविधाजनक हालात में रहने वाला शायद ही कोई अफसर समझ पाएगा।
मेतली के बसंत सिंह बिष्ट (26) के पेट में रविवार रात करीब आठ बजे अचानक दर्द उठा। क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर कोई स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांव भी मुख्य सड़क से 15 किमी दूर है। समय गुजरने के साथ-साथ बंसत की तकलीफ बढ़ती गई और जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया तो परिजनों ने उसे अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया। अंधेरा हो चुका था। तेज बारिश भी हो रही थी लेकिन परिवार के सदस्य की जान से बढ़कर तो कुछ नहीं होता। बस यही सोचकर परिवार के सदस्यों ने गांव के कुछ लोगों को मरीज को मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए मनाया।
इसके बाद लट्ठे पर चादर बांधकर डोली बनाई गई और बसंत को उसमें बैठाया गया। घनघोर अंधेरे के बीच ग्रामीण गांव से निकले और जब भीगते और अंधेरे को चीरते हुए बरम पहुंचे तो उस समय घड़ी रात के 1:30 बजा रही थी। यहां पहुंचकर भी दर्द से कराहते बसंत की तकलीफ कम नहीं हुई। इतनी रात में किसी वाहन के नहीं मिलने से उसे और ग्रामीणों को सुबह होने का इंतजार करना पड़ा।
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बसंत पूरी रात दर्द से कराहता रहा और परिजन बेबस होकर उसे दिलासा देते रहे। सुबह उजाला होने पर वाहन को बुक किया गया और पिथौरागढ़ लाकर उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया। रविवार रात से दर्द से कराहते बसंत को आखिर 14 घंटे बाद सोमवार सुबह 10 बजे इलाज नसीब हो पाया और उसकी जान बच सकी। डॉक्टर ने मरीज को पथरी की शिकायत बताई है। एक सप्ताह बाद उसका ऑपरेशन होगा।
जहां सिस्टम हारा वहां इनका हौसला काम आया
ग्रामीण गोपाल सिंह, पंकज सिंह, भगत सिंह, राजेंद्र सिंह बिष्ट, डिगर सिंह, देवेंद्र सिंह बिष्ट और दिनेश सिंह ने डोली में बसंत को पहले मुख्य सड़क तक और फिर अस्पताल पहुंचाया।
आखिर पहाड़ की यह तस्वीर कब बदलेगी
यह पहली बार नहीं है जब सीमांत के किसी गांव से मरीज को डोली में लाकर अस्पताल पहुंचाया गया हो। वर्षों से गांव को सड़क से जोड़ने की मांग ग्रामीण कर रहे हैं ताकि उनकी परेशानी कम हो सके और बीमारों तथा गर्भवतियों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जान बचाई जा सके लेकिन हालात नहीं बदल पा रहे हैं। मेतली ही नहीं इसके आसपास के कई गांव ऐसे हैं जहां न तो सड़क पहुंची और न स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। सिस्टम ने भी शायद इसे स्वीकार कर लिया है इसीलिए पहाड़ पर रह रहे लोगों की मुसीबतें कम करने के ठोस प्रयास धरातल पर साकार होते नहीं दिख रहे।।
दोपहर के दो बज जाएं तो नहीं मिलता इलाज
बंगापानी। मेतली गांव राज्य गठन के 25 साल बाद भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। हालात यह हैं कि यहां के ग्रामीणों को दोपहर दो बजे बाद किसी भी बीमारी का इलाज नहीं मिलता, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। बरम और बंगापानी में संचालित आयुर्वेदिक अस्पताल सुबह आठ से दोपहर दो बजे तक संचालित होता है। इसके बाद यहां इमरजेंसी सेवाएं भी संचालित नहीं होती। तय समय के बाद यदि कोई बीमार हो जाए तो उसे इलाज के लिए 75 किलोमीटर दूर धारचूला या 100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय जाना मजबूरी बन जाता है। यहां ऐलोपैथिक अस्पताल खोलने की मांग अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
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मेतली के बसंत सिंह बिष्ट (26) के पेट में रविवार रात करीब आठ बजे अचानक दर्द उठा। क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर कोई स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांव भी मुख्य सड़क से 15 किमी दूर है। समय गुजरने के साथ-साथ बंसत की तकलीफ बढ़ती गई और जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया तो परिजनों ने उसे अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया। अंधेरा हो चुका था। तेज बारिश भी हो रही थी लेकिन परिवार के सदस्य की जान से बढ़कर तो कुछ नहीं होता। बस यही सोचकर परिवार के सदस्यों ने गांव के कुछ लोगों को मरीज को मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए मनाया।
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इसके बाद लट्ठे पर चादर बांधकर डोली बनाई गई और बसंत को उसमें बैठाया गया। घनघोर अंधेरे के बीच ग्रामीण गांव से निकले और जब भीगते और अंधेरे को चीरते हुए बरम पहुंचे तो उस समय घड़ी रात के 1:30 बजा रही थी। यहां पहुंचकर भी दर्द से कराहते बसंत की तकलीफ कम नहीं हुई। इतनी रात में किसी वाहन के नहीं मिलने से उसे और ग्रामीणों को सुबह होने का इंतजार करना पड़ा।
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बसंत पूरी रात दर्द से कराहता रहा और परिजन बेबस होकर उसे दिलासा देते रहे। सुबह उजाला होने पर वाहन को बुक किया गया और पिथौरागढ़ लाकर उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया। रविवार रात से दर्द से कराहते बसंत को आखिर 14 घंटे बाद सोमवार सुबह 10 बजे इलाज नसीब हो पाया और उसकी जान बच सकी। डॉक्टर ने मरीज को पथरी की शिकायत बताई है। एक सप्ताह बाद उसका ऑपरेशन होगा।
जहां सिस्टम हारा वहां इनका हौसला काम आया
ग्रामीण गोपाल सिंह, पंकज सिंह, भगत सिंह, राजेंद्र सिंह बिष्ट, डिगर सिंह, देवेंद्र सिंह बिष्ट और दिनेश सिंह ने डोली में बसंत को पहले मुख्य सड़क तक और फिर अस्पताल पहुंचाया।
आखिर पहाड़ की यह तस्वीर कब बदलेगी
यह पहली बार नहीं है जब सीमांत के किसी गांव से मरीज को डोली में लाकर अस्पताल पहुंचाया गया हो। वर्षों से गांव को सड़क से जोड़ने की मांग ग्रामीण कर रहे हैं ताकि उनकी परेशानी कम हो सके और बीमारों तथा गर्भवतियों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जान बचाई जा सके लेकिन हालात नहीं बदल पा रहे हैं। मेतली ही नहीं इसके आसपास के कई गांव ऐसे हैं जहां न तो सड़क पहुंची और न स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। सिस्टम ने भी शायद इसे स्वीकार कर लिया है इसीलिए पहाड़ पर रह रहे लोगों की मुसीबतें कम करने के ठोस प्रयास धरातल पर साकार होते नहीं दिख रहे।।
दोपहर के दो बज जाएं तो नहीं मिलता इलाज
बंगापानी। मेतली गांव राज्य गठन के 25 साल बाद भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। हालात यह हैं कि यहां के ग्रामीणों को दोपहर दो बजे बाद किसी भी बीमारी का इलाज नहीं मिलता, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। बरम और बंगापानी में संचालित आयुर्वेदिक अस्पताल सुबह आठ से दोपहर दो बजे तक संचालित होता है। इसके बाद यहां इमरजेंसी सेवाएं भी संचालित नहीं होती। तय समय के बाद यदि कोई बीमार हो जाए तो उसे इलाज के लिए 75 किलोमीटर दूर धारचूला या 100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय जाना मजबूरी बन जाता है। यहां ऐलोपैथिक अस्पताल खोलने की मांग अब तक पूरी नहीं हो सकी है।