गौरैया को अब घरों में रहने का वातावरण नहीं मिलता
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अस्सी के दशक के बाद पहाड़ पर भवन निर्माण की परंपरागत शैली बदलने लगी। इससे पहले लोग लकड़ी और पत्थर की स्लेट वाली छत वाले मकान बनाते थे। इन मकानों के अगले हिस्से पर छोटे से सुराख बनाकर इसलिए छोड़ दिए जाते थे कि गौरैया उनमें अपना आशियाना बना ले। यही वजह है कि पहले पहाड़ के गांवों में गौरैया की चहचहाट के साथ ही लोगों की नींद खुलती थी। 1980 के बाद गांवों में लकड़ी और पत्थर की स्लेट वाले मकानों की जगह सीमेंट से बने मकानों ने ले ली। ऐसे मकानों में गौरैया के आवास की न तो जगह छोड़ी जाती है और न ऐसा संभव हो पाता है। हाल के वर्षों पहाड़ पर भी गौरैया की चहचहाट कम होने के पीछे यही कारण सामने आया है। बर्ड वाचर तो यह कहते हैं कि गौरैया समाप्त नहीं हुई है, वरन उसने अपना आशियाना घरों की कोटरों से छोड़कर जंगलों में बनाना शुरू कर दिया है।
नेचर फोरइवर सोसायटी ने गौरैया की घटती संख्या को देखते हुए 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाने का फैसला लिया। 20 मार्च को दुनियाभर के पक्षी प्रेमी गौरैया के संरक्षण की आवाज उठाते हैं। बर्ड वाचर सुरेंद्र पंवार ने बताया कि भारत में सात तरह की गौरैया मिलती हैं। कुमाऊं की पहाड़ियों पर हाउस स्पेरो और रसेट स्पेरो मिलती हैं। हाउस स्पेरो 2800 मीटर की ऊंचाई तक दिखती है। यही गौरैया घरों में घोंसला बनाया करती थी। रसेट स्पेरो 2800 से 3500 मीटर की ऊंचाई तक नजर आती है। यह सफेद रंग की होती है।
सुरेंद्र पंवार का कहना है कि जगह-जगह मोबाइल टावरों के लगने से भी गौरैया के लिए खतरा होने लगा था। यह बात अलग है कि पिछले तीन-चार साल से गौरैया ने खुद को नए माहौल में एडजस्ट कर लिया है। वह अब दुकानों की शटरों, पेड़ों के सुराख में घोंसला बना लेती है। इस सीजन में गौरैया घोंसला बनाती है। यही उसका प्रजनन काल भी होता है। थल में भी अब गौरैया के झुंड नजर आने लगे हैं। इससे लोगों को बड़ा सुकून मिलता है।
सीमेंट के मकान के पास लकड़ी का खांचा बना दें
बर्ड वाचर सुरेंद्र पंवार का कहना है कि सीमेंट के मकानों के पास लोगों को लकड़ी का खांचा बनाकर रखना चाहिए। ताकि गौरैया उसमें घोंसला बना सके। मदकोट क्षेत्र में कुछ स्थानों पर ऐसे खांचे बनाए गए हैं। उनमें गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती है। उन्होंने बताया कि मदकोट, मुनस्यारी, भुरमुनी, बांस घाटी में उनको पिछले दिनों गौरैया के झुंड दिखाई दिए।