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जिला, तहसील न सही ब्लॉक ही बन जाता अस्कोट
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अस्कोट कस्बा।
- फोटो : PITHORAGARH
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अस्कोट (पिथौरागढ़)। पिथौरागढ़ जिले का अस्कोट कस्बा आजादी के सात दशक बाद भी छोटी सी प्रशासनिक इकाई के लिए तरस रहा है। पाल राजाओं की राजधानी रहे अस्कोट को जिला तो दूर तहसील या विकासखंड तक नहीं बनाया गया।
अस्कोट का वैभवशाली इतिहास रहा है। पाल राजाओं के अधीन 80 कोट (किले) होने के कारण इसे अस्सीकोट कहा जाता था। बाद में इसका नाम अस्कोट पड़ गया। राज्य के संस्थापक कत्यूरी वंश के अभयदेव ने लखनपुर (अस्कोट में शामिल) को राजधानी बनाकर 1279 से राज शुरू किया।
इस राज्य का विस्तार करीब 900 वर्ग किमी तक था। इस रियासत के अंतिम राजा टिकेंद्र पाल थे। आजादी के 20 साल बाद 11 नवंबर 1967 को इस रियासत का भारत सरकार में विलय हो गया।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो कस्बा कभी 80 किलों का केंद्र था उसे विलय के बाद उपेक्षित छोड़ दिया गया। अस्कोट से जिला मुख्यालय 67 किमी दूरी पर है। तहसील मुख्यालय 18 किमी दूर डीडीहाट और विकासखंड मुख्यालय कनालीछीना की दूरी 30 किमी है।
इससे लोगों को तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अस्कोट को एक प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग के लिए क्षेत्र की जनता वर्षों से मांग कर रही है। लेकिन जनता की मांग को अनसुना ही किया गया है।
आंदोलनों को नहीं दी तवज्जो
वर्ष 2001 में एसपीएफ का प्रशिक्षण केंद्र बनाने के लिए 15 एकड़ जमीन ली गई लेकिन यह केंद्र भी नरेंद्रनगर टिहरी में बना दिया गया। सरकारी विभागों के नाम पर यहां बीआरओ, लोक निर्माण विभाग और जल संस्थान के कार्यालय हैं।
अस्कोट को प्रशासनिक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए कई आंदोलन हुए लेकिन किसी भी हुकूमत ने इसे तवज्जो नहीं दी। सुविधाओं के अभाव में कई परिवारों ने अस्कोट से पलायन कर दिया है। समाजसेवी तनुज पाल का कहना है कि अस्कोट की आज तक उपेक्षा की गई है। जबकि इसे प्रशासनिक इकाई बनाया जाना चाहिए था।
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अस्कोट का वैभवशाली इतिहास रहा है। पाल राजाओं के अधीन 80 कोट (किले) होने के कारण इसे अस्सीकोट कहा जाता था। बाद में इसका नाम अस्कोट पड़ गया। राज्य के संस्थापक कत्यूरी वंश के अभयदेव ने लखनपुर (अस्कोट में शामिल) को राजधानी बनाकर 1279 से राज शुरू किया।
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इस राज्य का विस्तार करीब 900 वर्ग किमी तक था। इस रियासत के अंतिम राजा टिकेंद्र पाल थे। आजादी के 20 साल बाद 11 नवंबर 1967 को इस रियासत का भारत सरकार में विलय हो गया।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो कस्बा कभी 80 किलों का केंद्र था उसे विलय के बाद उपेक्षित छोड़ दिया गया। अस्कोट से जिला मुख्यालय 67 किमी दूरी पर है। तहसील मुख्यालय 18 किमी दूर डीडीहाट और विकासखंड मुख्यालय कनालीछीना की दूरी 30 किमी है।
इससे लोगों को तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अस्कोट को एक प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग के लिए क्षेत्र की जनता वर्षों से मांग कर रही है। लेकिन जनता की मांग को अनसुना ही किया गया है।
आंदोलनों को नहीं दी तवज्जो
वर्ष 2001 में एसपीएफ का प्रशिक्षण केंद्र बनाने के लिए 15 एकड़ जमीन ली गई लेकिन यह केंद्र भी नरेंद्रनगर टिहरी में बना दिया गया। सरकारी विभागों के नाम पर यहां बीआरओ, लोक निर्माण विभाग और जल संस्थान के कार्यालय हैं।
अस्कोट को प्रशासनिक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए कई आंदोलन हुए लेकिन किसी भी हुकूमत ने इसे तवज्जो नहीं दी। सुविधाओं के अभाव में कई परिवारों ने अस्कोट से पलायन कर दिया है। समाजसेवी तनुज पाल का कहना है कि अस्कोट की आज तक उपेक्षा की गई है। जबकि इसे प्रशासनिक इकाई बनाया जाना चाहिए था।