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Pithoragarh News: रिंगाल के डंडों से तोड़ रहे गेहूं की बालियां
Sun, 14 May 2023 11:00 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 14 May 2023 11:00 PM IST
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नाचनी क्षेत्र के खेतों में डंडों से गेहूं की कटाई करती महिला किसान। संवाद
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नाचनी (पिथौरागढ़)। देश आधुनिक तकनीक से युक्त कृषि यंत्रों से बुआई और कटाई होने के बावजूद नाचनी क्षेत्र के किसान आज भी पाषाण पद्धति से कृषि कार्य कर रहे हैं। इसके तहत किसान रिंगाल के डंडों से गेहूं की बालियां तोड़ रहे हैं।
नाचनी क्षेत्र में रबी की फसल गेहूं और जौ कटाई आज भी पाषाण पद्धति से हो रही है। महिला किसान रिंगाल के दो डंडों से बालियां तोड़ कर संग्रह कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह पाषाणकालीन तकनीक बेहद कारगर है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र से लगे क्षेत्रों के वातावरण में हमेशा आद्रता बनी रहती है। स्थानीय स्तर पर बादल छाने से बारिश होती रहती है।
इससे तैयार फसल पर भी नमी का प्रभाव पड़ जाता है जिस कारण इसे तने से काट कर रखने से थ्रेशर मशीन से मड़ाई भी नहीं हो पाती है। तना सहित काटने से भंडारण का आयतन बढ़ने के साथ दाना निकालने में बहुत परेशानी होती है। दो डंडों के सहारे बालियां तोड़ने से कम क्षेत्रफल में समेटने के साथ सूखने और थ्रेशिंग में आसानी होती है।
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इस पद्धति से स्थानीय स्तर पर डंडे बनाने वाले को रोजगार भी मिलता है। हर साल क्षेत्र का एक युवक रबी की फसलों के दौरान रिंगाल के डंडों को जुटाता है। क्षेत्र के किसानों की यह पद्धति गेहूं कटाई में लाभकारी होने के साथ ही रोजगार का साधन भी बनी है।
गोरी गंगा घाटी और मुनस्यारी में होता है इस्तेमाल
नाचनी (पिथौरागढ़)। पिथौरागढ़ जिले के गोरी गंगा घाटी, हिमालयी क्षेत्र मुनस्यारी का मल्ला जोहार, तल्लाजोहार और बागेश्वर के कपकोट का हिमालयी क्षेत्र के लोग पाषाण पद्धति का इस्तेमाल गेहूं और जौ कटाई के लिए करते हैं।
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नाचनी क्षेत्र में रबी की फसल गेहूं और जौ कटाई आज भी पाषाण पद्धति से हो रही है। महिला किसान रिंगाल के दो डंडों से बालियां तोड़ कर संग्रह कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह पाषाणकालीन तकनीक बेहद कारगर है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र से लगे क्षेत्रों के वातावरण में हमेशा आद्रता बनी रहती है। स्थानीय स्तर पर बादल छाने से बारिश होती रहती है।
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इससे तैयार फसल पर भी नमी का प्रभाव पड़ जाता है जिस कारण इसे तने से काट कर रखने से थ्रेशर मशीन से मड़ाई भी नहीं हो पाती है। तना सहित काटने से भंडारण का आयतन बढ़ने के साथ दाना निकालने में बहुत परेशानी होती है। दो डंडों के सहारे बालियां तोड़ने से कम क्षेत्रफल में समेटने के साथ सूखने और थ्रेशिंग में आसानी होती है।
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इस पद्धति से स्थानीय स्तर पर डंडे बनाने वाले को रोजगार भी मिलता है। हर साल क्षेत्र का एक युवक रबी की फसलों के दौरान रिंगाल के डंडों को जुटाता है। क्षेत्र के किसानों की यह पद्धति गेहूं कटाई में लाभकारी होने के साथ ही रोजगार का साधन भी बनी है।
गोरी गंगा घाटी और मुनस्यारी में होता है इस्तेमाल
नाचनी (पिथौरागढ़)। पिथौरागढ़ जिले के गोरी गंगा घाटी, हिमालयी क्षेत्र मुनस्यारी का मल्ला जोहार, तल्लाजोहार और बागेश्वर के कपकोट का हिमालयी क्षेत्र के लोग पाषाण पद्धति का इस्तेमाल गेहूं और जौ कटाई के लिए करते हैं।