उत्तराखंड: मुनस्यारी के थैलस गार्डन में एक साथ दिखेंगी लाइकेन की 391 प्रजातियां
वन विभाग मुनस्यारी के पातलथौड़ में थैलस गार्डन बना रहा है। इस गार्डन में काई (लाइकेन) की 391 प्रजातियां देखने को मिलेंगी। पिथौरागढ़ वन प्रभाग की ओर से स्थापित मुनस्यारी नेचर एजुकेशन एवं इको पार्क सेंटर के सहयोग से बन रहा यह गार्डन देश का पहला गार्डन होगा जो शोधकर्ताओं, जिज्ञासुओं और छात्रों के लिए उपयोगी साबित होगा।
हाल ही में नौ हजार फीट की ऊंचाई पर ट्यूलिप गार्डन तैयार करने के बाद वन विभाग मुनस्यारी में थैलस गार्डन विकसित कर रहा है। इस गार्डन में तमाम तरह के शैवाल, ब्रायोफाइट्स और कवक नजर आएंगे। पिथौरागढ़ जिले में सूक्ष्म पादप में लाइकेन की 391 प्रजातियां, ब्रायोफाइट्स की 226 और कवकों की 49 प्रजातियां पाई जाती हैं।
इनमें से लगभग 60 प्रतिशत प्रजातियां ऐसी हैं जो मुनस्यारी में पाई जाती हैं। मुनस्यारी के खलियाटॉप ट्रैक में लाइकेन की एक सौ से अधिक प्रजातियां हैं। लाइकेन का यह बगीचा पर्यावरण प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए काफी उपयोगी साबित होगा।
लाइकेन को माना जाता है जुरासिक युग का पौधा
थैलस का अर्थ एक सूक्ष्म हरी शाक, जिनमें जड़, तना, पत्ती की संरचनाएं नहीं पाई जाती हैं। थैलस पादप मुख्य रूप से शैवाल, कवक और हरितोद्भिद लाइकेन जैसे झुला घास आदि के सूक्ष्म पादप के समूह से बनते हैं। ये थैलस पादप वनस्पति जगत में सबसे निचले वर्ग में आते हैं। यह नम स्थानों पर होता है। थैलस पादपों के समूह में लाइकेन को जुरासिक युग (लिविंग फॉसिल) का माना जाता है।
पारिस्थितिकी तंत्र में है महत्वपूर्ण योगदान
पारिस्थितिकी तंत्र एवं पर्यावरण संतुलन में इन सूक्ष्म पादपों का बड़ा योगदान माना जाता है। लाइकेन समूह जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण के संकेतक के रूप में जाने जाते हैं। ग्रीन हाउस गैसों के संतुलन में भी इन पादपों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
एंटीबायोटिक दवाएं और मसालों में होता है प्रयोग
पिथौरागढ़। थैलस पादपों का उपयोग एंटीबायोटिक दवाएं, मसाले, नेचुरल डाई आदि उत्पादों को बनाने में होता है। इन्हें प्राकृतिक एंटीबायोटिक भी कहा जाता है।
थैलस पादपों से संबंधित जानकारी एवं संरक्षण के महत्व को देखते हुए मुनस्यारी के पातलथौड़ में 10 हेक्टेअर में गार्डन विकसित किया जा रहा है। यह शोधार्थियों , जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिए लाभकारी साबित होगा।
- विनय भार्गव, डीएफओ पिथौरागढ़।