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सीमांत की व्यास घाटी में चहल-पहल तो दारमा में सुनसानी
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दारमा घाटी का दांतू गांव।
- फोटो : PITHORAGARH
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धारचूला (पिथौरागढ़)। चीन सीमा से लगी धारचूला की व्यास घाटी में चहल-पहल है तो दारमा घाटी में सुनसानी छाई है। दारमा घाटी के सभी 14 गांवों के घरों में ताले लगे हुए हैं। इस घाटी में सीमा सुरक्षा में तैनात आईटीबीपी के जवान ही गश्त कर रहे हैं।
चीन और नेपाल सीमा से लगे धारचूला में व्यास, चौदास और दारमा नाम से तीन घाटियां हैं। चौदास में नारायण आश्रम और पांगू आदि गांव हैं। इस घाटी में सालभर लोग रहते हैं, जबकि व्यास और दारमा घाटियों में बर्फबारी के कारण शीतकाल में निचले इलाकों की ओर पलायन हो जाता है। व्यास घाटी में सात गांव तो दारमा में 14 गांव हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा व्यास घाटी से होकर संचालित होती है। ओम पर्वत और आदि कैलाश भी इसी घाटी में हैं। इन दोनों घाटियों में हर साल मार्च में लोग अपने जानवरों के साथ जाते हैं। पहले नवंबर में दोनों घाटियों में बर्फबारी शुरू होते ही लोगों के अपने पशुओं के साथ धारचूला लौट आने से पूरी तरह से सुनसानी हो जाती थी, लेकिन इस साल व्यास घाटी में शीतकाल में भी लोगों की आवाजाही बनी है। ऐसा लिपुलेख तक सड़क बनने और चीन से तनातनी के बाद अग्रिम चौकियों में सुरक्षा बलों की अधिक संख्या में तैनाती है।
बीआरओ के डेढ़ सौ से अधिक मजदूर सड़क सुधार के काम में जुटे हैं, जबकि दारमा घाटी के सभी 14 गांवों के लोग निचले इलाकों में आ गए हैं। वहां पर केवल आईटीबीपी के जवान ही गश्त कर रहे हैं। दारमा घाटी में पंचाचूली ग्लेशियर होने के कारण कुछ पर्यटक आवागमन करते हैं। दातू गांव में होम स्टे चलाने वाले संजय दताल, महेश दताल और नरेंद्र दताल का कहना है कि दारमा घाटी को सड़क से तो जोड़ दिया गया है लेकिन बर्फबारी होने पर ग्लेशियर हटाने के कोई इंतजाम नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि शीतकाल में बर्फ हटाने के इंतजाम होते तो स्थानीय लोगों के साथ ही पर्यटकों की आवाजाही भी बनी रहती। प्रशासन को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए।
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बंद घरों की छतों को तोड़कर भालू पहुंचाते हैं नुकसान
धारचूला (पिथौरागढ़)। दारमा घाटी के 14 गांव जब जनशून्य हो जाते हैं तो वहां पर फिर जंगली जानवर आने लगते हैं। हिमालयी भालू यहां के बंद पड़े घरों की छतों के पत्थर निकालकर घरों में रखी गई खाद्य सामग्री को नुकसान पहुंचाते हैं। पिछले कुछ सालों से दारमा घाटी में भालुओं का आतंक है। इससे लोगों को हर साल नुकसान उठाना पड़ता है। अधिक बर्फबारी होने पर पुराने भवनों की छतों के टूटने का भी खतरा रहता है।
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दारमा घाटी के गांव - सेला, चल, नागलिंग, बालिंग, बोन, फिलम, दुग्तू, सौन, दांतू, गो, ढाकर, तिदांग, मार्छा, सीपू।
व्यास घाटी के गांव- बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाभी, रोंगकांग, कुटी।
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चीन और नेपाल सीमा से लगे धारचूला में व्यास, चौदास और दारमा नाम से तीन घाटियां हैं। चौदास में नारायण आश्रम और पांगू आदि गांव हैं। इस घाटी में सालभर लोग रहते हैं, जबकि व्यास और दारमा घाटियों में बर्फबारी के कारण शीतकाल में निचले इलाकों की ओर पलायन हो जाता है। व्यास घाटी में सात गांव तो दारमा में 14 गांव हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा व्यास घाटी से होकर संचालित होती है। ओम पर्वत और आदि कैलाश भी इसी घाटी में हैं। इन दोनों घाटियों में हर साल मार्च में लोग अपने जानवरों के साथ जाते हैं। पहले नवंबर में दोनों घाटियों में बर्फबारी शुरू होते ही लोगों के अपने पशुओं के साथ धारचूला लौट आने से पूरी तरह से सुनसानी हो जाती थी, लेकिन इस साल व्यास घाटी में शीतकाल में भी लोगों की आवाजाही बनी है। ऐसा लिपुलेख तक सड़क बनने और चीन से तनातनी के बाद अग्रिम चौकियों में सुरक्षा बलों की अधिक संख्या में तैनाती है।
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बीआरओ के डेढ़ सौ से अधिक मजदूर सड़क सुधार के काम में जुटे हैं, जबकि दारमा घाटी के सभी 14 गांवों के लोग निचले इलाकों में आ गए हैं। वहां पर केवल आईटीबीपी के जवान ही गश्त कर रहे हैं। दारमा घाटी में पंचाचूली ग्लेशियर होने के कारण कुछ पर्यटक आवागमन करते हैं। दातू गांव में होम स्टे चलाने वाले संजय दताल, महेश दताल और नरेंद्र दताल का कहना है कि दारमा घाटी को सड़क से तो जोड़ दिया गया है लेकिन बर्फबारी होने पर ग्लेशियर हटाने के कोई इंतजाम नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि शीतकाल में बर्फ हटाने के इंतजाम होते तो स्थानीय लोगों के साथ ही पर्यटकों की आवाजाही भी बनी रहती। प्रशासन को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए।
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बंद घरों की छतों को तोड़कर भालू पहुंचाते हैं नुकसान
धारचूला (पिथौरागढ़)। दारमा घाटी के 14 गांव जब जनशून्य हो जाते हैं तो वहां पर फिर जंगली जानवर आने लगते हैं। हिमालयी भालू यहां के बंद पड़े घरों की छतों के पत्थर निकालकर घरों में रखी गई खाद्य सामग्री को नुकसान पहुंचाते हैं। पिछले कुछ सालों से दारमा घाटी में भालुओं का आतंक है। इससे लोगों को हर साल नुकसान उठाना पड़ता है। अधिक बर्फबारी होने पर पुराने भवनों की छतों के टूटने का भी खतरा रहता है।
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दारमा घाटी के गांव - सेला, चल, नागलिंग, बालिंग, बोन, फिलम, दुग्तू, सौन, दांतू, गो, ढाकर, तिदांग, मार्छा, सीपू।
व्यास घाटी के गांव- बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाभी, रोंगकांग, कुटी।