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विसरा जांच के लिए ले गई आईवीआरआई के डॉक्टरों की टीम

Fri, 06 Oct 2017 10:48 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बेड़ीनाग
ब्यूरो/अमर उजाला, बेड़ीनाग Updated Fri, 06 Oct 2017 10:48 PM IST
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IVR doctors team for visas test
महरूड़ी का कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र - फोटो : अमर उजाला

कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र महरूड़ी ने पिछले चार दिन के अंतराल में तीन कस्तूरा मृगों की मौत के बाद से खलबली मची है। शुक्रवार को भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के डॉक्टरों की टीम ने यहां का दौरा किया और मृत मृगों का विसरा जांच के लिए अपने साथ ले गई। महरूड़ी के इस केंद्र में अब नौ नर और सात मादा कस्तूरा मृग ही बचे हैं।

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आईवीआरआई के डॉ. पीएस बनर्जी के नेतृत्व में आई टीम ने कस्तूरा मृग के आवास, भोजन, आसपास के वातावरण का निरीक्षण किया। डॉ. बनर्जी ने बताया कि अभी मृगों की मौत के बारे में तत्काल कुछ कह पाना संभव नहीं है। जांच रिपोर्ट के बाद ही पता चलेगा कि मौत कैसे हुई है। डॉक्टरों की टीम ने केंद्र के प्रभारी डा. एलएमएस नयाल से कई विषयों की विस्तार से जानकारी ली। टीम अपनी रिपोर्ट केंद्रीय आयुष मंत्रालय को भेजेगी, क्योंकि इस केंद्र का संचालन यही मंत्रालय करता है।
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बेहद संवेदनशील होता है कस्तूरा मृग
बेड़ीनाग (पिथौरागढ़)। उच्च हिमालयी क्षेत्रों से लाकर कस्तूरा मृग को पालने एवं उनका प्रजनन बढ़ाने के मकसद से 1977 में बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले की सीमा पर महरूड़ी में खोले गए कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र की कार्यप्रणाली को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। यह केंद्र अपने उद्देश्य में ज्यादा सफल न हो पाने के कारण पिछले वर्षों से इसे नैनीताल शिफ्ट करने की बात भी उठ रही थी। कस्तूरा मृग बेहद शर्मीला स्वभाव का होता है और यह लोगों को देखकर भागता है। हालांकि, महरूड़ी स्थित केंद्र में इनको चारों ओर तारबाड़ कर रखा गया है। यह अन्य प्रकार की कोई वनस्पति नहीं खाता। सिर्फ पाषाणभेद (लमेड़) की पत्तों को खाकर ही जिंदा रहता है। बताया गया कि कस्तूरा मृग दिखने में स्वस्थ लगते हैं, लेकिन उनकी मौत अचानक हो जाती है। महरूड़ी का यह केंद्र एक एकड़ में फैला है। इसी में कस्तूरा मृग के बाड़े, चारे की घास और स्टाफ कक्ष बने हैं। जानकारों का कहना है कि यदि कस्तूरा मृग की देखरेख सही ढंग से होती तो अब तक इनकी संख्या यहां सैकड़ों में पहुंच जाती। वैसे कस्तूरा मृग की आयु 18 वर्ष ही होती है। जिन मृगों की मौत हुई उनकी उम्र तीन, छह और आठ साल थी। इनमें एक नर और दो मादा हैं। कस्तूरा मृग की नाभि से कस्तूरी निकलती है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में इनका अवैध शिकार तेजी से बढ़ा है। कस्तूरा नामक दुर्लभ पदार्थ सिर्फ युवा नर की नाभि में ही मिलता है।
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कस्तूरा मृग की कोई गणना नहीं
अस्कोट (पिथौरागढ़)। कस्तूरा मृग उच्च हिमालयी क्षेत्र के छिकलाकेदार, घनधूरा के जंगलों में मिलता है। अस्कोट मृगविहार क्षेत्र में कस्तूरा मृग को निचले इलाकों में नहीं देखा जाता। उच्च हिमालयी क्षेत्र में इनकी संख्या कितनी है, इसका कोई रिकार्ड वन विभाग के पास नहीं है। वन रेंजर केआर टम्टा का कहना है कि लंबे समय से कस्तूरा मृग की कोई गणना नहीं हुई है।

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