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Pithoragarh News: नेताजी के भाषण से प्रभावित होकर प्रताप ने कर दी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत
Fri, 11 Aug 2023 11:06 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Fri, 11 Aug 2023 11:06 PM IST
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पिथौरागढ़। देश की आजादी की लड़ाई में सीमांत के जिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान रहा उनमें डीडीहाट के उड़मा निवासी प्रताप सिंह भी शामिल थे। गरीबी के कारण ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए प्रताप सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाषण से ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत कर आजाद हिंद फौज की वर्दी पहन ली। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
सिंगाली के उड़मा निवासी प्रताप सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारतीय की पीड़ा करीब से देखी थी। जब वह 11 वर्ष के थे तब 1938 में कांग्रेस के चार आने के सदस्य बने। बाद में गरीबी और परिवार की हालत को देखते हुए वे ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गए। 1940 में अफ्रीका, मिश्र, लीबिया सहित कई स्थानों पर लड़ाई लड़ी और उनके साथ ही अन्य सैनिकों को कैद कर लिया गया। उन्हें इटली के अफगाना शिविर में रखा गया। उस शिविर में पहुंचे सरदार भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने बताया कि भगत सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दे दी है। भारतीयों पर अत्याचार की बात सुनकर सभी सैनिक बेहद दुखी और आक्रोशित हुए।
जब प्रताप सिंह को अन्य सैनिकों के साथ जर्मनी के ख्युनिस वर्ग शिविर में रखा गया था तो एक दिन वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस शिविर में पहुंचे। नेताजी के अंग्रेजों से लड़ाई के लिए आजाद हिंद फौज का गठन करने की बात से वह इतने प्रभावित हुए कि उनके साथ ही 20000 जवानों ने ब्रितानी वर्दी उतारकर आजाद हिंद फौज की पोशाक पहन ली। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तमाम विपरीत हालातों में 1945 तक लड़ाई लड़ी। उनकी पत्नी खीमा देवी ने अपने चार बच्चों पुत्री शकुंतला, मोतिमा, सरस्वती और पुत्र कल्याण सिंह के लालन पालन के लिए तमाम संघर्ष झेले। इसके बाद प्रताप सिंह ने परिवार के भरण पोषण के लिए अहमदाबाद में कॉटन मिल में नौकरी की। वर्ष 1997 में पैतृक गांव उड़मा में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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सिंगाली के उड़मा निवासी प्रताप सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारतीय की पीड़ा करीब से देखी थी। जब वह 11 वर्ष के थे तब 1938 में कांग्रेस के चार आने के सदस्य बने। बाद में गरीबी और परिवार की हालत को देखते हुए वे ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गए। 1940 में अफ्रीका, मिश्र, लीबिया सहित कई स्थानों पर लड़ाई लड़ी और उनके साथ ही अन्य सैनिकों को कैद कर लिया गया। उन्हें इटली के अफगाना शिविर में रखा गया। उस शिविर में पहुंचे सरदार भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने बताया कि भगत सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दे दी है। भारतीयों पर अत्याचार की बात सुनकर सभी सैनिक बेहद दुखी और आक्रोशित हुए।
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जब प्रताप सिंह को अन्य सैनिकों के साथ जर्मनी के ख्युनिस वर्ग शिविर में रखा गया था तो एक दिन वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस शिविर में पहुंचे। नेताजी के अंग्रेजों से लड़ाई के लिए आजाद हिंद फौज का गठन करने की बात से वह इतने प्रभावित हुए कि उनके साथ ही 20000 जवानों ने ब्रितानी वर्दी उतारकर आजाद हिंद फौज की पोशाक पहन ली। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तमाम विपरीत हालातों में 1945 तक लड़ाई लड़ी। उनकी पत्नी खीमा देवी ने अपने चार बच्चों पुत्री शकुंतला, मोतिमा, सरस्वती और पुत्र कल्याण सिंह के लालन पालन के लिए तमाम संघर्ष झेले। इसके बाद प्रताप सिंह ने परिवार के भरण पोषण के लिए अहमदाबाद में कॉटन मिल में नौकरी की। वर्ष 1997 में पैतृक गांव उड़मा में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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