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तल्ला जोहार के पांच गांवों में हुई खुदा पूजा
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खुदा पूजा में भंडारे के लिए पूड़ियां बेलती महिलाएं।
- फोटो : PITHORAGARH
नाचनी (पिथौरागढ़)। मुनस्यारी विकासखंड के तल्लाजोहार क्षेत्र के पांच गांवों में खुदा पूजा संपन्न हो गई है। इसमें मुख्य रूप से भगवान अलखनाथ (शिव) और महाकाली की पूजा की जाती है। कोरोना काल के चलते गांवों में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना के संक्षिप्त कार्यक्रम आयोजित किए।
धूनी और दीपकों की होती है पूजा
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा में धूनी (अग्नि) स्थापना मुख्य रहता है। धूनी स्थापना के लिए पंडित शुभ लग्न तय करते हैं। इसके बाद धूनी जलाई जाती है और मंदिर में दीपकों को प्रज्ज्वलित किया जाता है। (संवाद)
दिव्य वृक्ष पदम को दिया जाता है न्योता
नाचनी (पिथौरागढ़)। धूनी, दीपक जलाने के बाद देव डांगर अवतरित होते हैं। देव डंगरिये ढोल, नगाड़ों, झझर आदि वाद्य यंत्रों के साथ गांव के पदम वृक्ष को आमंत्रण देते हैं।
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रात्रि में लगता है मेला
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा में केवल पूजा-अर्चना ही नहीं बल्कि झोड़े, चांचरी भी गाए जाते हैं। श्रद्धालु रात भर भजन-कीर्तन करते हैं। झोड़े चांचरी, न्योली आदि पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। सुबह होते ही भंडारे की तैयारी की जाती हैं। प्रसाद में पूरी और अन्य सामग्री बनाई जाती है। दिन भर भंडारा चलता है।
इन गांवों में होती है खुदा पूजा
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा तल्लाजोहार के गांवों ( सैनराथी, किमखेत, बेडूमहर, डोर, होकरा, नामिक, उमुली, गिन्नी, समकोट, डोकुला, लोद, सेलमाली, कोट्यूडा, नाचनी और भैंसखाल) में प्रति तीसरे, पांचवें और सातवें वर्ष में आयोजित होती है। इस बार सैनराथी, डोकुला, सेलमाली, कोट्यूडा और भैंसखाल के पांच गांवों में खुदा पूजा की गई। इसके अलावा बागेश्वर जिले के कपकोट विकासखंड में गोगिना, रातिर, केटी, शामा समेत कई गांवों में भी खुदा पूजा की जाती है।
शिव और महाकाली की होती है पूजा
जीवन दानू
नाचनी (पिथौरागढ़)। तल्ला जोहार के गांवों में हर तीसरे, पांचवें और सातवें साल में होने वाली इस पूजा को भले ही खुदा पूजा कहा जाता हो, लेकिन असल में यह पूजा अलखनाथ भगवान शिव और महाकाली की होती है।
पहले यह पूजा घरों के भीतर की जाती थी। बाथर आंगन में धूनी रमाई जाती थी। अब लोगों ने बाहर खुले में मंदिर बना दिए हैं। जहां पर पूजा अर्चना की जाती है। बुजुर्गों के अनुसार खुदा पूजा की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। अलखनाथ (भगवान शिव) और महाकाली की पूजा-अर्चना को खुदा पूजा कहने पर कई लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने भी इस पूजा को खुदा पूजा के नाम से ही मनाते हुए देखा है। इस पूजा को कुछ लोग लगभग छह सौ वर्ष पूर्व मुगल साम्राज्य से चली आने की बात भी कहते हैं।
नाचनी क्षेत्र के 90 वर्षीय पुजारी कल्याण राम ने बताया कि उनके पिताजी खीम राम बताते थे कि हमारे पूर्वज मुगल शासन के दौरान शिव महाकाली की पूजा कर रहे थे। इसी बीच अचानक मुगल प्रशासक पहुंचे। पूजा के बारे में पूछने पर भय से उन्होंने शिव की पूजा को खुदा पूजा बताया। तब से इस पूजा का नाम खुदा पूजा पड़ गया। (संवाद)
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धूनी और दीपकों की होती है पूजा
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा में धूनी (अग्नि) स्थापना मुख्य रहता है। धूनी स्थापना के लिए पंडित शुभ लग्न तय करते हैं। इसके बाद धूनी जलाई जाती है और मंदिर में दीपकों को प्रज्ज्वलित किया जाता है। (संवाद)
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दिव्य वृक्ष पदम को दिया जाता है न्योता
नाचनी (पिथौरागढ़)। धूनी, दीपक जलाने के बाद देव डांगर अवतरित होते हैं। देव डंगरिये ढोल, नगाड़ों, झझर आदि वाद्य यंत्रों के साथ गांव के पदम वृक्ष को आमंत्रण देते हैं।
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रात्रि में लगता है मेला
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा में केवल पूजा-अर्चना ही नहीं बल्कि झोड़े, चांचरी भी गाए जाते हैं। श्रद्धालु रात भर भजन-कीर्तन करते हैं। झोड़े चांचरी, न्योली आदि पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। सुबह होते ही भंडारे की तैयारी की जाती हैं। प्रसाद में पूरी और अन्य सामग्री बनाई जाती है। दिन भर भंडारा चलता है।
इन गांवों में होती है खुदा पूजा
नाचनी (पिथौरागढ़)। खुदा पूजा तल्लाजोहार के गांवों ( सैनराथी, किमखेत, बेडूमहर, डोर, होकरा, नामिक, उमुली, गिन्नी, समकोट, डोकुला, लोद, सेलमाली, कोट्यूडा, नाचनी और भैंसखाल) में प्रति तीसरे, पांचवें और सातवें वर्ष में आयोजित होती है। इस बार सैनराथी, डोकुला, सेलमाली, कोट्यूडा और भैंसखाल के पांच गांवों में खुदा पूजा की गई। इसके अलावा बागेश्वर जिले के कपकोट विकासखंड में गोगिना, रातिर, केटी, शामा समेत कई गांवों में भी खुदा पूजा की जाती है।
शिव और महाकाली की होती है पूजा
जीवन दानू
नाचनी (पिथौरागढ़)। तल्ला जोहार के गांवों में हर तीसरे, पांचवें और सातवें साल में होने वाली इस पूजा को भले ही खुदा पूजा कहा जाता हो, लेकिन असल में यह पूजा अलखनाथ भगवान शिव और महाकाली की होती है।
पहले यह पूजा घरों के भीतर की जाती थी। बाथर आंगन में धूनी रमाई जाती थी। अब लोगों ने बाहर खुले में मंदिर बना दिए हैं। जहां पर पूजा अर्चना की जाती है। बुजुर्गों के अनुसार खुदा पूजा की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। अलखनाथ (भगवान शिव) और महाकाली की पूजा-अर्चना को खुदा पूजा कहने पर कई लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने भी इस पूजा को खुदा पूजा के नाम से ही मनाते हुए देखा है। इस पूजा को कुछ लोग लगभग छह सौ वर्ष पूर्व मुगल साम्राज्य से चली आने की बात भी कहते हैं।
नाचनी क्षेत्र के 90 वर्षीय पुजारी कल्याण राम ने बताया कि उनके पिताजी खीम राम बताते थे कि हमारे पूर्वज मुगल शासन के दौरान शिव महाकाली की पूजा कर रहे थे। इसी बीच अचानक मुगल प्रशासक पहुंचे। पूजा के बारे में पूछने पर भय से उन्होंने शिव की पूजा को खुदा पूजा बताया। तब से इस पूजा का नाम खुदा पूजा पड़ गया। (संवाद)